आमतौर पर दिल्ली जून के अंत तक दिल्ली में मानसून का आगमन हो जाता है। यही वजह रही कि मानसून के देरी से आगमन व लौटने के कारण पड़ोसी राज्यों में पराली जलने की घटनाएं देरी से रिकॉर्ड की गईं। बीते अक्तूबर के आंकड़ों से गौर करें तो 20 से 30 अक्तूबर तक पराली जलने की कम घटनाएं रिकॉर्ड की गईं। 30 अक्तूबर तक प्रदूषण में पराली के धुएं की हिस्सेदारी अधिकतम 20 फीसदी पहुंची थी, जबकि नवंबर के पहले सप्ताह में 36 फीसदी तक पहुंच गया।
सप्ताह के अंत तक पराली का धुआं 48 फीसदी तक दर्ज किया गया जो कि इस सीजन की सबसे अधिक पराली के धुएं की हिस्सेदारी दर्ज की गई थी। सफर के आंकड़ों के मुताबिक, नौ से 13 नवंबर के बीच पराली के धुएं की हिस्सेदारी 30 फीसदी तक रिकॉर्ड की गई है, जबकि 30 अक्तूबर से तीन नवंबर तक प्रदूषण में इसकी हिस्सेदारी सिर्फ आठ फीसदी रही थी।
दिवाली के बाद बिगड़े हालात
राजधानी में प्रदूषण को लेकर सबसे अधिक हालात दिवाली के बाद बिगड़े। चार नवंबर को पटाखों के साथ पराली के धुएं ने भी दिल्ली की हवा को प्रदूषित किया। यही वजह रही कि पांच नवंबर को दिल्ली का एक्यूआई 462 के स्तर पर पहुंच गया। इस दिन पराली के धुएं की हिस्सेदारी 41 फीसदी रही थी। पांच से सात नवंबर लगातार तीन दिनों तक हवा गंभीर श्रेणी में रही थी। इसके बाद 11 नवंबर से 13 नवंबर तक हवा की स्थिति गंभीर रही। इस बीच 12 नवंबर को 471 एक्यूआई के साथ आपातकाल जैसी स्थिति हो गई थी। इसके बाद 25 नवंबर से 28 नवंबर तक लगातार हवा गंभीर श्रेणी में बनी हुई है।
बीते पांच सालों में दिल्ली में वाहनों का दबाव भी बढ़ा है। इसके अलावा प्रदूषण फैलानी वाली अन्य गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है। दूसरी ओर मानसून का देरी से आगमन और पराली जलने पर प्रभाव पड़ने से प्रदूषण के स्तर पर प्रभाव पड़ा है। मौसमी दशाओं ने भी दिल्ली के प्रदूषण को बढ़ाने में मदद की है। इस वजह से प्रदूषण के अधिक दिन दर्ज किए गए हैं।
-डॉ. एसके त्यागी, पूर्व अतिरिक्त निदेशक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
दिल्ली में अपना प्रदूषण पहले से ही मौजूद है। दिवाली पर जलने वाले पटाखे व पराली का धुआं इसका और बढ़ाने में और मदद कर देते हैं। इस वजह से दिल्ली के हालात बिगड़ जाते हैं। दिल्ली के प्रदूषण को कम करना है तो धरातल पर काम करने की जरूरत है।
-भुवन भास्कर, पर्यावरण विशेषज्ञ