देश के मेडिकल छात्रों की यूक्रेन में जिंदगी बचाने की जद्दोजहद चार दिन बाद आईजीआई एयरपोर्ट पहुंचने पर खत्म हो गई। मंगलवार दोपहर करीब 1:30 बजे रोमानिया से चलकर एयरपोर्ट के टी-3 पर जब विमान उतरा तो अपने बच्चों को देखते ही परिजनों और दोस्तों की आंखों से आंसू छलक आए। किसी ने बिटिया को गले लगाया तो कोई अपनी मां के आंचल से लिपट गया।
बेटी से मिलने की खुशी में हाथ में कन्हैया की मूर्ति लिए एक मां ने सभी भारतीय छात्र-छात्राओं के खैरियत की दुआएं मांगी। बगैर खाना और पानी, रोमानिया बॉर्डर पर ठिठुरती रात (तापमान शून्य से छह डिग्री नीचे) बिताने वाले छात्र-छात्राओं को चार दिन बाद अपनों से मिलने पर राहत मिली। अभी भी कई विद्यार्थियों के चेहरे पर सदमे का साफ असर दिख रहा था। सभी छात्रों ने अपने दोस्तों समेत सभी भारतीयों की सकुशल वापसी के लिए सरकार से गुहार लगाई है। यूक्रेन में खाने की तलाश में गए छात्र की मौत ने सभी के परिजनों की चिंता और बढ़ा दी है।
छात्रों ने बताया कि यूक्रेन के शहरों से रोमानिया बॉर्डर पर पहुंचने के लिए 20-30 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। इसके बाद रोमानिया सीमा को पार करने की चुनौती ऐसी, जिसे कोई भी छात्र दोबारा याद नहीं करना चाहता है। एक छात्र ने बॉर्डर क्षेत्र को बेहद खराब हालात में बताया। इंडिगो एयरलाइंस की फ्लाइट के पहुंचने के बाद जैसे ही छात्र-छात्राएं बाहर आए, बेसब्री से इंतजार कर रहे परिजन भावुक हो गए।
घंटों इंतजार के बाद जब अपनों के चेहरे पर सुकून देखकर आंसू नहीं रोक सके। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मेघालय, उड़ीसा, राजस्थान सहित देश के तमाम राज्यों के छात्रों के स्वागत में पहुंचे लोगों के हाथों में गुलदस्ता तो कुछ मां अपने बेटे-बेटी के लिए पसंदीदा खाना लेकर पहुंचीं।
यूक्रेन के सुरक्षाकर्मियों में दिखी नाराजगी : पश्चिमी यूक्रेन की एक यूनिवर्सिटी में मेडिकल की पढ़ाई करने वाले एक छात्र ने बताया कि वाहनों का काफिला होने की वजह से करीब 15 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। इस दौरान खुद की जिंदगी बचाने की होड़ मची हुई थी। महज तीन-चार फुट की गेट से बारी-बारी से छात्रों को रोमानिया में प्रवेश दिया जा रहा था। अफरातफरी होने पर सुरक्षा कर्मियों ने सख्ती की और रबर की गोलियां भी चलाईं।
एक-दूसरे से लिपट गई मां-बेटी
रोहतक की जाह्नवी का उनकी मां और भाई एयरपोर्ट पर इंतजार कर रही थे। जैसे ही वह पहुंची, बाल गोपाल के साथ अपनी बिटिया को लेने पहुंची। पहली झलक दिखते ही दोनों एक दूसरे से लिपट गई और उनकी सकुशल वापसी की खुशी में आंखों से आंसू छलक पड़े।
पैरासिटामॉल खाकर रोमानिया बॉर्डर पर गुजारी रात
लखनऊ निवासी अपूर्वा ने कहा कि चार-पांच दिन से सो नहीं सकीं। रोमानिया बॉर्डर पर भारी भीड़ ने ठिठुरन के बीच रात गुजारने के लिए पैरासिटामॉल का सहारा लिया। मेडिकल के छात्र सौरभ ने बताया कि रोमानिया में प्रवेश के लिए करीब 40 घंटे का इंतजार करना पड़ा। इस दौरान बिजनौर, शामली और बागपत के भी कई दोस्त थे। छह दोस्तों ने बताया कि उन्हें रोमानिया सीमा तक पहुंचने के लिए करीब 20 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। इससे अधिक मुश्किल खुले आसमान के तले सर्द रातें बितानी पड़ी।
छात्र की मौत के बाद अभिभावकों की बढ़ी चिंता
दिल्ली एयरपोर्ट पर हापुड़ के आकाश डागर के पिता जयविंदर ने कहा कि उन्हें अपने बेटे के साथ सभी भारतीय छात्रों के पहुंचने का इंतजार है। एक छात्र की मौत के बाद चिंता और बढ़ गई है। दिल्ली के सुल्तानपुर माजरा के रहने वाले पुनीत ने बताया कि यूक्रेन में संकट के बढ़ने के बाद से छात्रों की नींद उड़ गई। हालांकि, सरकार और दूतावास की तरफ से की जा रही कोशिशों के लिए धन्यवाद करते हुए इसमें तेजी लाने की अपील की, ताकि छात्रों की जान बचाई जा सके। छात्रों ने बंकर में छुपकर रातें बिताई, फिर खुले आसमान के नीचे बॉर्डर पर रोमानिया में प्रवेश करने के लिए इंतजार करना पड़ा। ब्यूरो
सरकार से लगाई गुहार
दिल्ली की सिमरन अपने तीन दोस्तों के साथ जब एयरपोर्ट पहुंची तो उन्हें रिसीव करने परिवार के सभी सदस्य पहुंचे। अपनी दोस्त प्रिया रावत ने भी कहा कि यहां पहुंचने के बाद उन्होंने राहत की सांस ली। सभी को अपने दोस्तों की चिंता अभी भी सता रही है। छात्र-छात्राओं ने केंद्र सरकार की तरफ से की जा रही कोशिशों की तारीफ करते हुए यूक्रेन में फंसे छात्रों को वहां से सुरक्षित निकालने की सरकार से गुहार लगाई।
जेहन में धमाकों की गूंज
मेरठ निवासी आलम ने वहां के हालात बयां करते हुए कहा कि लंबे समय तक सीमा पर काफी मुश्किलों से जूझना पड़ा। आपस में मिलकर दोस्तों ने बस का इंतजाम किया, ताकि बॉर्डर तक पहुंच सके। अगर किसी के पास पैसों की कमी थी तो एक दूसरे की मदद की, लेकिन यूूक्रेन में न तो बैंक और न ही एटीएम खुले थे। दिल्ली के शोएब अख्तर ने बताया बम धमाकों की आवाज अभी भी गूंज रही है।