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नसीहत : न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करना आग से खेलने जैसा, 10 लाख का जुर्माना लगाते हुए अदालत की टिप्पणी

Sun, 03 Apr 2022 06:47 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

अदालत ने कहा कि न्यायालय का उद्देश्य पक्षों के बीच न्याय प्रदान करना है। अदालत ने मामले की सुनवाई 11 अप्रैल तय की है। इस मुकदमे के एक अन्य पक्ष रविंदर सिंह ने संपत्ति मामले में रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका पर आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया था कि कब्जे के लिए मुकदमा चलने योग्य नहीं है। 
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court demo - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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अदालत ने सुभाष नगर स्थित एक पारिवारिक संपत्ति के संबंध में झूठे तथ्यों के आधार पर मुकदमे दायर करने वाले वादी पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने याचिका को झूठी और तुच्छ बताते हुए खारिज कर दी। इतना ही नहीं अदालत ने याची को नोटिस जारी कर स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि झूठी याचिका दायर करने पर क्यों न उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। 

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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश किशोर कुमार ने वादी गुरुचरण सिंह द्वारा दायर मुकदमे को खारिज करते हुए कहा कि जिस व्यक्ति का मामला झूठे तथ्यों पर आधारित है, उसे अदालत जाने का कोई अधिकार नहीं है। उसे मुकदमे के किसी भी चरण में सरसरी तौर पर बाहर किया जा सकता है। उन्होंने कहा न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करना आग से खेलने जैसा है। व्यक्ति को सावधान रहना चाहिए और परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।

अदालत ने कहा झूठी और तुच्छ दलीलों के आधार पर याचिका दायर करने पर उसे पर 10 लाख रुपये जुर्माना लगाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि याची की मां ने अपने दूसरे बेटे को संपत्ति 14 वर्ष पहले गिफ्ट की थी और अदालत के समक्ष दिए बयानों में याची ने स्वयं इस तथ्य को माना था। 
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ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि उसे तथ्यों की जानकारी नहीं थी। ऐसे में अदालत में झूठे दावे दायर करने का उद्देश्य कानून के शासन पर प्रहार करना है और कोई भी अदालत ऐसे आचरण की अनदेखी नहीं कर सकती है, जिसमें न्यायिक संस्थान में जनता के विश्वास को हिलाने की प्रवृत्ति हो। 

न्यायालय का उद्देश्य पक्षों के बीच न्याय प्रदान करना है। अदालत ने मामले की सुनवाई 11 अप्रैल तय की है। इस मुकदमे के एक अन्य पक्ष रविंदर सिंह ने संपत्ति मामले में रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका पर आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया था कि कब्जे के लिए मुकदमा चलने योग्य नहीं है। 

प्रत्यर्पण कार्रवाई की चुनौती याचिका पर आदेश सुरक्षित
उच्च न्यायालय ने 2017 में लंदन के एक पब में दुष्कर्म के एक मामले में भारतीय मूल के एक व्यक्ति के खिलाफ शुरू की गई प्रत्यर्पण कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। याचिकाकर्ता ने बोफोर्स भ्रष्टाचार मामले से जुड़े हिंदुजा बनाम सीबीआई मामले में फैसले के आधार पर कार्रवाई को चुनौती दी है। न्यायमूर्ति आशा मेनन ने याचिकाकर्ता और केंद्र के वकीलों द्वारा की गई दलीलों को सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया।

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