हत्या में छह दोषियों की सजा-ए-आजीवन कारावास को बरकरार रखते हुई कोर्ट ने की टिप्पणी
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि किसी हत्या के मामले में प्रत्यक्ष गवाहों की गवाही और चिकित्सा साक्ष्य मजबूत हों, तो अपराध का उद्देश्य पूरी तरह से साबित न होना भी दोषसिद्धि में बाधा नहीं बनता। न्यायमूर्ति प्रतिबा एम सिंह और न्यायमूर्ति अमित शर्मा की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए छह दोषियों की सजा-ए-आजीवन कारावास को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि अभियुक्तों की ओर से दी गई दलीलें साक्ष्यों के सामने टिकती नहीं हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि अपराध के हथियार की बरामदगी दोषसिद्धि के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है। भले ही अभियोजन यह साबित न कर पाए कि बरामद चाकू से ही हत्या हुई थी, लेकिन गवाहों की गवाही और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोप सिद्ध माने जाएंगे। यह मामला इब्राहिम नामक व्यक्ति की हत्या से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार, सभी छह आरोपी आधी रात को लाठी, चाकू, पिस्टल और क्रिकेट स्टंप लेकर मृतक की दुकान पर पहुंचे। वहां उन्होंने गालियां दीं, हमला किया और गोलीबारी की, जिसमें इब्राहिम की मौत हो गई। प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, आरोपी आरिफ ने इब्राहिम पर 5-6 गोलियां चलाईं। आबिद और जावेद ने उसे चाकू मारे। गुफरान और तारिफ ने क्रिकेट स्टंप से पीटा और जबकि इसराइल पहलवान ने लाठी से वार किया। इसके बाद सभी आरोपी मौके से फरार हो गए।
आरोपियों ने दावा किया कि मुख्य गवाह की मौजूदगी संदिग्ध थी और उसकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन अदालत ने पाया कि घटना के तुरंत बाद अभियुक्तों में से एक ने रात 12:22 बजे पुलिस को कॉल किया था। पुलिस मौके पर तुरंत पहुंच गई थी। अदालत ने कहा कि अभियुक्त के कपड़े मृतक के खून से सने हुए मिले। एफएसएल रिपोर्ट ने इसे वैज्ञानिक रूप से साबित किया। इसलिए घटनास्थल को फर्जी बताना संभव नहीं था।