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जिद का गीत, हौसले की मुस्कान: जंतर-मंतर की वो रात जब थकान भी हार गई

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(एक रात जंतर मंतर पर...)
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जंतर-मंतर पर छात्रों का जज्बा: थके चेहरे, पर हौसला बुलंद, खुद कर रहे सफाई

-कोई पंखा झलता रहा, कोई मरहम लगाता, कोई गीतों से जगाता रहा आंदोलन
-उमस भरी रात में हर चेहरा थका जरूर था, लेकिन हौसला कम नहीं हुआ था


अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर चारों तरफ शोर है, पर यह कोई आम शोर नहीं, यह आवाजों का एक गीत है जिद का, हौसले का, और उस अजीब-सी मुस्कान का जो थके हुए चेहरों पर भी किसी तरह टिकी हुई है। बृहस्पतिवार देर रात कहीं हाथ वाले पंखे (बेना) एक-दूसरे तक पहुंचाए जा रहे थे, तो कहीं घायल प्रदर्शनकारियों के जख्मों पर मरहम लगाया जा रहा था। कोई खाने के पैकेट बांट रहा था, तो कोई पानी की बोतलें। उमस भरी रात में हर चेहरा थका जरूर था, लेकिन हौसला कम नहीं हुआ था। ऐसे में जंतर-मंतर पर एक रात ‘अमर उजाला’ के संवाददाता नितिन राजपूत और सचिन कुमार ने बिताई पेश है रिपोर्ट
जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन की रात किसी धरना-स्थल से ज्यादा एक मेले जैसी लगी, लेकिन आंदोलनकारियों की व्यवस्था पूरे एक सिस्टम की तरह थी। तीन बजे सड़कों पर भारी चहल-पहल थी। छात्र-छात्राएं मुख्य सड़क पर नारेबाजी कर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। उनके हाथों में सरकार विरोधी नारे लिखे तख्तियां थीं। कुछ छात्र सड़क किनारे सिगरेट पीते हुए भी दिखाई दिए। सड़कों पर कुछ वाहन चल रहे थे, और प्रदर्शन के दौरान कभी-कभी चालकों को कुछ देर रुकना पड़ रहा था, हालांकि छात्र उन्हें निकलने दे रहे थे। तभी एक एंबुलेंस आई, और कुछ आंदोलनकारियों ने उसके लिए तुरंत रास्ता बनाया। जंतर-मंतर के आधा किलोमीटर के दायरे में ऐसे ही प्रदर्शन जारी थे।
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जंतर-मंतर को जाने वाली सड़क पर पुलिस का पहरा था। कई पुलिसकर्मी खड़े थे, तो कुछ कुर्सियों पर बैठकर झपकी ले रहे थे। सड़क के दोनों ओर छात्र-छात्राएं पोस्टर लिए खड़े थे। फुटपाथों पर कूड़े से भरे बड़े-बड़े गार्बेज बैग पड़े थे, लेकिन उधर ही सड़क किनारे और फुटपाथों पर आंदोलनकारी छात्र-छात्राएं झाड़ू लगा रहे थे, खुद ही कूड़ा उठा रहे थे। कई प्रदर्शनकारी फुटपाथ पर सोए हुए थे। यहां भी कोई गाना गा रहा था, तो कोई पोस्टर लेकर नारे लगा रहा था। अलग-अलग समूह नारे लगाते हुए घूम रहे थे।

जंतर-मंतर का मुख्य गेट -
जंतर-मंतर के मुख्य गेट पर पहुंचते ही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से जुड़े कार्यकर्ता और अन्य आंदोलनकारी जूस, कोल्ड ड्रिंक बांट रहे थे। अंदर जाने के रास्ते पर भीड़ थी। दीवारें सरकार-विरोधी नारों से पटी हुई थीं। अंदर जाने में धक्का-मुक्की न हो, इसलिए आंदोलनकारियों ने मानव श्रृंखला बना रखी थी। कई छात्र-छात्राएं रस्सा पकड़े खड़े थे। धरना-स्थल में जाने के लिए करीब 350 मीटर की लाइन लगी थी। अंदर जाते ही एक समूह पेंटिंग के जरिए सरकार और सिस्टम के कई चेहरों को दिखाती हुई प्रदर्शनी लगाए बैठा था, और कई लोग इसकी तस्वीरें ले रहे थे।

छात्र-छात्राएं हाथ के पंखों से लगा रहे थे हवा
धरने के दोनों ओर वामपंथी छात्र संगठनों के समूह अपने-अपने बैनर और सरकार-विरोधी पोस्टरों के साथ बैठे थे। मंच पर कुछ लोग सोए हुए थे, लेकिन ठीक सामने कई समूहों में देशभक्ति सहित कई गाने गाए जा रहे थे, और सरकार-विरोधी नारे भी लग रहे थे। सो रहे और गाना गा रहे लोगों को अन्य छात्र-छात्राएं पंखों से हवा कर रहे थे। पास ही छात्र-छात्राओं ने मेडिकल कैंप लगाया था, जहां घायलों सहित अन्य लोगों का इलाज चल रहा था।
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पूरे धरना-स्थल से लेकर आधा किलोमीटर के दायरे में मेले जैसा माहौल था। कई महिलाएं अपने छोटे बच्चों और पतियों के साथ धरना-स्थल पर आई थीं। अंदर से बाहर तक पीने के पानी के लिए जगह-जगह कैंपर और गिलास रखे हुए थे। वापसी में भी एक लाइन से ही लोगों को बाहर जाने दिया जा रहा था। धरना-स्थल से लेकर आधा किलोमीटर के दायरे में लोग बिना कहे सफ़ाई कर रहे थे। यह आंदोलन अपने आप में एक अनोखी मिसाल है।
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