नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने विशेष कानून के तहत विवाह करने वाले दो धर्मों के युवक-युवतियों के शादी का पंजीयन करने से पहले 30 दिन का नोटिस दिए जाने के प्रावधान को उचित बताया है। विधि एवं न्याय मंत्रालय ने हाईकोर्ट में प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करने का तर्क रखते हुए कहा कि यह व्यवस्था कानून के प्रावधान के तहत ही है।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल एवं न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ के समक्ष दाखिल जवाब में कहा है कि शादी करने वाले युवक-युवतियों के हित को ध्यान में रखते हुए यह प्रावधान किया गया है। पक्षकारों के संबंधियों को विवाह से ऐतराज है तो उसकी जांच किए बगैर रजिस्ट्रार शादी का पंजीयन नहीं करेंगे। जांच के लिए भी कम से कम 30 दिन चाहिए, इसलिए इस प्रावधान को किया गया है। इसलिए यह प्रावधान न्यायोचित व निष्पक्ष है।
याची निदा रहमान ने तर्क रखा कि यह प्रावधान भेदभावपूर्ण है, क्योंकि एक ही धर्म में शादी करने वाले के लिए ऐसा नोटिस भेजने का प्रावधान नहीं है, जबकि दो धर्मों के बीच शादी करने वाले का पंजीयन करने को लेकर 30 दिन का नोटिस भेजने का प्रावधान किया गया है।
याची ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत दिए गए समानता के अधिकार व अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। उन्होंने इस बाबत दो धर्मों के बीच शादी करने वालों के लिए बने विशेष विवाह कानून की धारा 6 और 7 को रद्द करने की मांग की है। इस मामले में कोर्ट ने केंद्र सरकार के विधि मंत्रालय एवं दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखने को कहा था।