आम आदमी पार्टी (आप) के बागी नेता योगेंद्र यादव ने भी सोमवार को अनुशासन समिति के कारण बताओ नोटिस का जवाब भेज दिया। यादव का आरोप है कि पार्टी अपने संविधान का उल्लंघन कर रही है।
वहीं, नोटिस को पूर्व रचित नाटक की पटकथा कहा है। बकौल यादव, ‘पार्टी ने फैसला कर लिया है। नोटिस भेजकर सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही है। नोटिस का जवाब न देने को अपराध माना जाता, इसी वजह से बेबुनियाद आरोपों पर चिट्ठी लिख रहा हूं।’ योगेंद्र यादव ने अरविंद केजरीवाल के दौर की तुलना रूसी तानाशाह स्टालिन से की है।
अनुशासन समिति के अध्यक्ष दिनेश बाघेला के नाम भेजी गई चिट्ठी में योगेंद्र यादव ने कई सवाल खड़े किए हैं। योगेंद्र ने हैरानी जताई है कि पार्टी को हराने के जिस आरोप के आधार पर उनके और प्रशांत भूषण के खिलाफ माहौल बनाया गया, उसका नोटिस में जिक्र तक नहीं है।
बहुमत के फैसले को भी नहीं माना गया
अगर वह आरोप झूठे थे, तो आरोप लगाने वाले पर क्या कार्रवाई होगी। यादव ने कहा है कि 17 अप्रैल को नोटिस मिलने से पहले ही चिट्ठी मीडिया में लीक हो गई। क्या इसे भी अनुशासन के दायरे माना जाएगा।
पार्टी के संस्थागत निकायों की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए योगेंद्र यादव ने कहा, ‘आप के निर्णय लेने वाले निकायों की अनदेखी हुई है। फरवरी, 2014 में दिल्ली सरकार से इस्तीफा, लोकसभा चुनाव में वाराणसी और अमेठी से चुनाव लड़ने के फैसलों में मनमानी हुई।’
उन्होंने कहा, ‘प्रदेश इकाइयों को विधानसभा चुनाव के बारे में निर्णय लेने की अनुमति देने के पक्ष में राष्ट्रीय कार्यकारिणी का बहुमत (15/4) था। लेकिन फैसला लागू नहीं हुआ। मुख्यमंत्री के धरने पर बैठने के पीएसी के फैसले को अरविंद केजरीवाल ने खुद ही पलट दिया था। इस साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों का चयन में पीएसी को सही तरीके से शामिल नहीं किया गया।’
पहले राष्ट्रीय संयोजक को भेजा जाए नोटिस
योगेंद्र यादव का कहना है, ‘यदि आपकी समिति स्वराज संवाद को अनुशासनहीनता मानती है तो पार्टी लाइन से हटकर मीडिया में दिए गए बयानों पर राष्ट्रीय संयोजक को नोटिस भेजा जाएगा। मसलन, शपथ ग्रहण समारोह के दौरान अरविंद केजरीवाल की पार्टी को दिल्ली में सीमित रखने की घोषणा किस समिति से मंजूर हुई थी?’
एक पुस्तक का जिक्र करते हुए योगेंद्र यादव ने आखिर में लिखा है, ‘मनमाने फैसले, निष्कासन, बदले की कार्रवाई, चरित्र हनन, दुष्प्रचार और फिर सारे कृत्यों को सही ठहराने के लिए भावनात्मक नौटंकी, ये सारी बातें स्टालिन के शासन की सच्चाई है।
मैंने हमेशा कहा है कि यहां एक अंतर है, यहां निर्वासन (कालापानी) के लिए साइबेरिया नहीं है। साथ ही योगेंद्र यादव ने उम्मीद जताई है कि उन्हें नहीं पता कि समिति के दो सदस्यों का रुख क्या होगा, लेकिन जेपी आंदोलन से निकले दिनेश बाघेला स्टालिन की बहुत सी बुराईयों को उभरने नहीं देंगे।