विश्व अल्जाइमर दिवस
-एम्स के शोध में 12 सप्ताह के योग से अल्जाइमर मरीजों की सोचने-समझने की क्षमता में सुधार, आंत के अच्छे बैक्टीरिया में भी बदलाव
सिमरन
नई दिल्ली। सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी रमेश बाबू (68) का जीवन अनुशासन और शालीनता से भरा रहा, लेकिन अल्जाइमर डिमेंशिया ने उनके व्यवहार में ऐसा बदलाव किया कि परिवार और आसपास के लोगों के लिए स्थिति मुश्किल हो गई। एक दिन पार्क में कॉलोनी के कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अपनी पत्नी को पहचानने से इनकार कर दिया और पास खड़ी एक महिला के साथ असहज व्यवहार किया। घटना के बाद पड़ोसियों ने उन्हें ताने देने शुरू कर दिए, व्हाट्सएप ग्रुप से अलग कर दिया और पार्क में लोग अपने बच्चों को उनसे दूर रखने लगे। परिवार भी शर्म और तनाव में आ गया।
स्थिति बिगड़ने पर परिवार उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल के वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. लोकेश शेखावत के पास लेकर पहुंचा। डॉ. शेखावत ने बताया कि यह चरित्र दोष नहीं, बल्कि बीमारी से जुड़ा व्यवहारिक बदलाव था। अल्जाइमर में दिमाग के वे हिस्से प्रभावित हो सकते हैं जो सामाजिक मर्यादा और आवेगों को नियंत्रित करते हैं। इसे सोशल डिसइन्हिबिशन कहा जाता है। दवा, व्यवहार प्रबंधन और परिवार की काउंसलिंग से कुछ सप्ताह में रमेश बाबू के आवेग कम होने लगे।
योग से सोचने-समझने और मूड में सुधार
अल्जाइमर से जूझ रहे मरीजों के लिए एम्स दिल्ली के शोध से भी एक नई संभावना सामने आई है। शोधकर्ताओं ने शुरुआती अल्जाइमर वाले 16 मरीजों को 12 सप्ताह तक रोजाना 60 मिनट पर्यवेक्षित योग कराया। अध्ययन में उनका मॉन्ट्रियल कॉग्निटिव असेसमेंट (एमओसीए) स्कोर औसतन 22.33 से बढ़कर 25.44 हुआ, जबकि डिप्रेशन का पीएचक्यू-9 स्कोर 5.78 से घटकर 2.22 रह गया। तुलना के लिए 17 स्वस्थ लोगों को भी अध्ययन में शामिल किया गया।
योग के बाद मरीजों के आंत के माइक्रोबायोम में भी बदलाव देखा गया। कुछ लाभकारी बैक्टीरिया बढ़े और सूजन से जुड़े बैक्टीरिया कम हुए। एम्स की न्यूरोलॉजी विभाग प्रमुख प्रोफेसर डॉ. मंजरी त्रिपाठी और एनाटॉमी विभाग की डॉ. रीमा दादा भी शोध से जुड़ी हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, ये निष्कर्ष गट-ब्रेन एक्सिस यानी आंत और मस्तिष्क के संबंध को समझने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि योग अल्जाइमर का इलाज नहीं है और बड़े, रैंडमाइज्ड ट्रायल की जरूरत है। इसे दवाओं और चिकित्सकीय देखभाल के साथ सहायक जीवनशैली के तौर पर देखा जा सकता है। दिल्ली में भी देखभाल की सुविधाएं बढ़ रही हैं। एआरडीएसआई दिल्ली चैप्टर एम्स, आरएमएल और सफदरजंग अस्पताल के साथ डे-केयर सेंटर पर काम कर रहा है, जबकि लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में जेरिएट्रिक मेमोरी क्लिनिक उपलब्ध है।