लाल किला, कुतुब मीनार और हुमायूं का मकबरा देखने दिल्ली पहुंच रहे विदेशी पर्यटक शहर की उन गलियों और बाजारों से अनजान लौट रहे हैं, जहां सदियों पुरानी कला, कारीगरी और व्यापार की विरासत आज भी जिंदा है। दरिबा कलां की चांदी और इत्र की दुकानें, किनारी बाजार की जरी-गोटा कारीगरी, खारी बावली का मसाला कारोबार और दरियागंज का पुरानी किताबों का बाजार पर्यटकों को आकर्षित तो करते हैं, लेकिन इनके पीछे की कहानियां और सांस्कृतिक महत्व बताने की कोई व्यवस्थित व्यवस्था नहीं होने से वे इन्हें महज खरीदारी की जगह समझकर निकल जाते हैं।
- हेरिटेज वॉक से जुड़े लोगों का कहना है कि पर्यटकों में स्थानीय संस्कृति को जानने की रुचि बढ़ रही है, जरूरत सिर्फ उन्हें सही जानकारी और मार्गदर्शन देने की है।
पुरानी दिल्ली की अनकही कहानियां
दरिबा कलां में चांदी के आभूषण और इत्र की 80 साल से पुरानी दुकानें हैं। किनारी बाजार में रंग-बिरंगे गोटे और जरी का काम आज भी हाथ से होता है। खारी बावली मसालों के पुराने व्यापार की कहानी कहती है। नाई सड़क और दरियागंज में पुरानी किताबों का बाजार दिल्ली की बौद्धिक विरासत को दर्शाता है। इन जगहों पर पीढ़ियों से एक ही हुनर को संभाला जा रहा है।