विशेषज्ञों का कहना है कि अवसाद की समस्या हर घर में है। इसे बढ़ने से रोका जा सकता है। ऐसी समस्याओं को समझने के लिए एम्स में मंगलवार को मेंटल हेल्थ फेस्टिवल का आयोजन किया गया। इस बारे में एम्स के मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर ऐसे आयोजन से लोगों को मानसिक समस्या के बारे में बताया जा रहा है।
अक्सर मरीज सिजोफ्रेनिया, डिप्रेशन, एंग्जाइटी, आटिज्म जैसी गंभीर स्थिति होने पर अस्पताल आते हैं। जबकि लक्षण सभी को पहले से पता चल जाते हैं, लेकिन लोग डर व संकोच के कारण इस मामले में बात नहीं करते। यदि ऐसे रोग पर खुलकर बात की जाए तो समस्या गंभीर नहीं होगी। ऐसे उत्सव की मदद से अवसाद की समस्या को दूर किया जा सकता है।
इस आयोजन में बड़े स्तर पर स्कूल, कॉलेज के छात्र-छात्राओं को बुलाया जाता है। ये संवेदनशील होते हैं और अपनी समस्या को आसानी से बताना पसंद नहीं करते। ऐसे आयोजन की मदद से उनके मनोरोग को आसानी से दूर किया जाता है। उन्होंने कहा कि दवा ऐसे समस्याओं में केवल विकल्प है। इससे बचने के लिए खुलकर बात करने और समय पर डॉक्टरों की सलाह लेनी चाहिए।
हम काले हैं तो क्या हुआ
उत्सव में आए स्कूली बच्चों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्हें काला, चश्मा पहनने वाला बैटरी, मोटा, भद्दा कहकर चिढ़ाने का प्रयास किया गया। शुरूआत में यह सुनकर वे गुमसुम हो गए। घर में भी अकेले रहने लगे। बाद में डॉक्टरों के समझाने के बाद ऐसी फब्तियों को सुनने पर खुद को मजा आने लगा। अब जिंदगी पहले से और मजेदार हो गई है। अपने नाम से ज्यादा फब्तियां सुनने में मजा आता है।
खुद की बुराई बनती है बीमारी की जड़ : उत्सव में आई महिलाओं ने चर्चा के दौरान बताया कि घर में कोई न कोई उनकी कमी निकालता है। जब इससे परेशान होकर मनोविशेषज्ञ के पास पहुंचीं तो वहां सभी इससे परेशान दिखे।
वहां डॉक्टरों ने बताया कि यह समाज का हिस्सा है। हर घर में कोई न कोई बुराई निकालने वाला होता है। यह एक प्रकार से तनाव मुक्त होने का तरीका है। इससे परेशान होने की जगह आनंद लिया जाए और खुलकर बात समस्या को दूसरों से साझा करें तो अवसाद की समस्या खत्म हो जाएगी।