इसके कारण ही उनके गुर्दे खराब हुए और पहला प्रत्यारोपण 2001 में किया। करीब 13 वर्ष तक गुर्दे ने मरीज के शरीर में रहकर पर्याप्त कार्य किया, लेकिन धीरे-धीरे वह शरीर का साथ छोड़ रहा था। इसके कारण साल 2014 में दूसरा प्रत्यारोपण किया। पहली बार में बड़ी बहन अंशु वालिया और दूसरी बार में बहन रितु पाहवा ने गुर्दा दान किया था। डॉ. संदीप गुलेरिया का कहना है कि तीनों बहनों के जीन समान हैं।
दूसरे प्रत्यारोपण के बाद मरीज के शरीर में दूसरी बहन का गुर्दा ज्यादा प्रभावी नहीं हो सका। इसी बीच महिला को गैंग्रीन भी हो गया था। इसके चलते आंतों का ऑपरेशन करना पड़ा। डॉ. गुलेरिया का कहना है कि कुछ ही समय पहले जब दूसरी बार में प्रत्यारोपित गुर्दे ने शरीर का साथ छोड़ दिया तो तीसरी बार प्रत्यारोपण किया। इस बार मरीज के पति तरुण कालरा ने गुर्दा दान किया। चूंकि तरुण का रक्त समूह मरीज से अलग था।
इसलिए डॉ. गुलेरिया ने बताया कि अलग रक्त समूह होने के कारण चिकित्सीय तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ये प्रत्यारोपण किया है। उन्होंने बताया कि महिला फिलहाल स्वस्थ हैं। तीसरी बार गुर्दा प्रत्यारोपण के अलावा दूसरा विकल्प आजीवन डायलिसिस था। परिजनों को पूरे केस के बारे में जानकारी होने के बाद उन्होंने प्रत्यारोपण ही कराने का फैसला लिया था।