एम्स के नेफ्रोलॉजी विभाग में सबसे पहले वर्ष 1972 में पहला गुर्दा प्रत्यारोपण किया गया था, जबकि 1971 में पहला डायलिसिस हुआ था। तब से लेकर अब तक प्रत्यारोपण की ये संख्या 2800 पार हो चुकी है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर संसाधन पूरे होते तो येे आंकड़ा कई गुना ज्यादा हो सकता था। हर सप्ताह में करीब तीन प्रत्यारोपण किए जा रहे हैं। वहीं प्रतिदिन ओपीडी में पहुंच रहे 200 में से करीब 160 से 170 मरीज क्रोनिक किडनी डिजीज यानी गुर्दा फेल या डायलिसिस की स्थिति में पहुंच रहे हैं। वेटिंग की बात करें तो इस समय एम्स में गुर्दा प्रत्यारोपण कराने के लिए मरीज को 8 माह की वेटिंग दी जा रही है।
सुषमा-जेटली करा चुके हैं गुर्दे का इलाज
कई साल से पिछड़ेपन के शिकार इस विभाग में केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और वित्त मंत्री अरुण जेटली गुर्दा प्रत्यारोपण करा चुके हैं। यहां चौंकाने वाली बात है कि दोनों ही नेताओं के लिए बाहर से प्रत्यारोपण की टीमें एम्स आई थीं, जबकि यहां के डॉक्टर सिर्फ उनका फॉलोअप लेते रहे। सूत्र बताते हैं कि इस दुर्दशा के बारे में इन नेताओं को भी जानकारी दी गई, जिसके बाद कुछ सुगबुगाहट शुरू हुई, लेकिन चंद माह बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मिलने के बाद भी डॉक्टरों को संजीवनी नहीं मिली।
111 मरीजों को ही प्रत्यारोपण का पंजीयन
एम्स की 62वीं वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2017-18 में एम्स के इस नेफ्रोलॉजी विभाग में 52,930 मरीज इलाज के लिए पहुंचे, इनमें से नए मरीज 11,823 थे। वहीं प्रत्यारोपण के लिए यहां साल भर में 10,970 मरीजों को उपचार मिला। इनमें से गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए 111 नए मरीजों को ही पंजीयन मिल सका। इसके अलावा पिछले वर्ष विभाग में 157 मरीजों की मौत हुई। इनमें से 54 लोगों ने भर्ती होने के 48 घंटे के भीतर दम तोड़ा। विभाग में मरीजों की मृत्युदर 1 फीसदी है।