शिक्षा के क्षेत्र में मेवात की महिलाएं भले ही पिछड़ी हों पर कला के क्षेत्र में आगे हैं। मेवात की महिलाऐं अपनी कला के बलबूते पर अपने हुनर का लोहा विदेशों तक मनवा चुकी हैं।
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करीब बीस वर्ष पहले यूनिसेफ टीम के सदस्यों ने इन महिलाओं की कला की तारीफ की थी। यदि सरकार मेवात की इस धरोहर कला चंगेरी, बीजना की तरफ ध्यान दे तो यह यहां एक कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हो सकता है।
मेवात की महिलाओं द्वारा गेंहू की बाली की सीकों से तैयार की गई चंगेरी और बीजना की करीब 20 वर्ष पहले डीआरडीए गुड़गांव द्वारा प्रदर्शनी भी लगाई जा चुकी है। मेवात में महिलाओं का शिक्षण अनुपात करीब चार प्रतिशत है।
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चंदेरी कला
- फोटो : अमर उजाला
मेवात में मुस्लिम लड़कियों के परिजन उनको सरकारी स्कूलों मे भेजने की बजाय मस्जिदों, मदरसों में दीनी तालीम दिलाना ही उचित समझते हैं या फिर प्राइमरी तक शिक्षा दिला कर रह जाते हैं।
चंगेरी, बीजना, डलियों में गेंहू की सीकों से हिंदी, अंग्रेजी में नाम लिखना, फूल, गमले, पशु, पक्षी बनाना मानो उनका बायें हाथ का खेल है। मेवात में रोटी रखने के लिए बनाई जाने वाली चंगेरी व हाथ का पंखा बनाने की तैयारी में ये महिलाऐं बैसाख के महीने से ही जुट जाती हैं। गेहूं की कटाई के समय देशी गेहूं की बालों की लंबी-लंबी सीकों को तोड़ लेती हैं।
उसके बाद इनको विभिन्न रंगों में रंग लेती हैं। चंगेरी और डलियों को महिलाऐं खासतौर से सावन के महीने में बनाती हैं। इसके दो कारण होते हैं एक तो महिलाओं को खेत खलिहान का खास काम नहीं होता, दूसरे बरसात के मौसम में नमी होने के कारण सीखों में भी नमी आ जाती है, जिसकी वजह से ये टूटती नहीं हैं।
यूनिसेफ की टीम ने की तारीफ
- फोटो : demo pic
इस कला से जुडी मिसकीना, रुखसाना, समीना का कहना है कि वे इन चंगेरी ओर बीजनों को घरेलू इस्तेमाल के लिये बनाती हैं या फिर रिश्तेदारियों में इन्हें एक सौगात के रूप में भेंट किया जाता है। एक चंगेरी बनाने में 8 से 10 दिन लग जाते हैं। यदि उन्हें पूरा समय दिया जाए तो वे एक चंगेरी एक-दो दिन में तैयार कर सकती हैं।
मेवात में अब देशी गेहूं बहुत कम बोया जाता है। जिसकी वजह से देशी गेहूं की बालें मिलना मुश्किल हो जाती हैं। इसी का फायदा उठाते हुए उद्योगपतियों ने बाजार में प्लास्टिक की सीकें उतार दी हैं। इनसे चंगेरी तो बन जाती हैं पर उनमें क्वालिटी नहीं होती है।
याद रहे कि वर्ष 1989-90 में मेवात के दौरे पर आई 22 देशों के यूनिसेफ टीम के सदस्यों ने भी मेवात की इस कला की जमकर तारीफ ही नहीं की, अपने साथ भी ले गए। लगभग 6 साल पहले यूके की एक संस्था ने नगीना में 25 गांवों का दौरा किया था और कहा था कि मेवात की इस अदभुत कला को लंदन के बाजारों में बेचा जाएगा।
मेवात की एसईडीएस संस्था के महासचिव डॉ. अब्दुल अजीज का कहना है कि वर्ष 1993-94 में डीआरडीए गुड़गांव की ओर से मेवात की इस कला को बढ़ावा देने के लिये मेवात की 35 महिलाओं को पुन्हाना के रहीडा, बीसरू और इन्दाना में ट्रेनिंग दी गई थी।
उस समय डीआरडीए ने विश्वास दिलाया था कि ट्रेनिंग देकर उत्पाद बनाए जाएंगे और उन्हें विदेशों में बेचा जाएगा। एडवोकेट नूरदीन नूर, रमजान चौधरी, डॉ. बशीर अहमद का कहना है कि सरकार और प्रसाशन इस ओर ध्यान दे तो मेवात की यह कला एक कुटीर उद्योग का रूप ले सकती है।
मेवात में एक चंगेरी 100 से 150 रुपये तक आसानी से मिल सकती है, जिसे विदेशों में एक हजार से ऊपर आसानी से बेचा जा सकता है।