डॉक्टरों की मानें तो आमतौर पर छोटी छोटी जगहों से दिल्ली जैसे मेट्रो शहरों तक दान में मिले अंग को लेकर आना कई बार संभव नहीं हो सकता। जिसके चलते काफी दिक्कतें आती हैं। लेकिन इस तकनीक ने परेशानी को दूर कर दिया है। साथ ही अंगदान को बढ़ावा देने में यह मदद भी करेगी।
डॉ. सोइन ने बताया कि अतिरिक्त संरक्षण समय मिलने से प्रत्यारोपण टीम को किसी भी जटिलताओं से निपटने के लिए अधिक समय मिलता है, इससे उन रोगियों में भी लिवर प्रत्यारोपित किया जा सकता है जिनमें लिवर प्रत्यारोपण करना संभव नहीं होता है।
उन्होंने बताया कि तकनीक यूरोप, अमेरिका और कनाडा में 300 से अधिक प्रत्यारोपण करवा चुकीहै। भारत में इसका पहली बार इस्तेमाल पिछले महीने बेंगलुरु के एस्टर सीएमआई अस्पताल में 56 वर्षीय मरीज में किया गया था। रोगी की बहुत जल्द रिकवरी हुई और उसे कुछ ही हफ्तों में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।