मुरादनगर ब्लाक के डिडौली गांव के दो घोड़ों में खतरनाक बीमारी ग्लैंडर्स की पुष्टि हो जाने के बाद बृहस्पतिवार को (आज) उन्हें मौत के घाट उतारा जाएगा।
राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार से जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद पशुपालन विभाग ने उन्हें इयूथैनेशिया (जहरीले इंजेक्शन) के जरिए मौत की नींद सुलाने की तैयारी कर ली है।
मौत के बाद घोड़ों को गांव के उन्हें दफना दिया जाएगा। ग्लैंडर्स की पुष्टि होने के बाद अन्य पशुओं और इंसानों में भी बीमारी फैलने का खतरा बन गया है। ऐसे में पशुपालन विभाग गांव के अन्य घोड़ों और पशुओं के सैंपल कलेक्ट कर जांच कराएगा।
19 सितंबर को पशुपालन विभाग की टीम ने सुबोध कुमार के दो घोड़ों के ब्लड और सीरम सैंपल राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार भेजे थे। राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र के विशेषज्ञों ने सोमवार को फिर से गांव पहुंचकर घोड़ों के ब्लड सैंपल लिए थे।
हिसार में जांच के बाद बुधवार को उन्होंने ईमेल के जरिए गाजियाबाद के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा.बिजेंद्र त्यागी को जांच रिपोर्ट भेज दी है।
रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद बुधवार को ही मुख्य पशु चिकित्साधिकारी ने डीएम को इसकी सूचना देकर घोड़ों को मारने की अनुमति ले ली है। बृहस्पतिवार को पुलिस की मौजूदगी में घोड़ों को इंजेक्शन देकर मारा जाएगा।
जिले भर में अलर्ट, पशु चिकित्सकों को निर्देश जारी
दो घोड़ों में ग्लैंडर्स की पुष्टि के बाद पशुपालन विभाग ने पूरे जिले में अलर्ट जारी कर दिया है। जिले के सभी क्षेत्रों में तैनात पशु चिकित्सकों को अलर्ट रहने और अपने क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
ग्लैंडर्स के लक्षण मिलने या संदेह होने पर तत्काल संक्रमित पशुओं के सैंपल लेकर जांच के लिए भेजे जाएंगे। डिडौली गांव में मौजूद सभी घोड़ों के सैंपल लेकर जांच कराई जाएगी। -डा. बिजेंद्र त्यागी, मुख्य पशु चिकित्सक
निगरानी में रहेगा घोड़े मालिक का परिवार
मुख्य पशु चिकित्सक डा.बिजेंद्र त्यागी ने बताया कि घोड़े मालिक के परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य पर भी निगरानी रखी जाएगी। हालांकि ग्लैंडर्स का संदेह होते ही उन्हें बीमार घोड़ों के पास न जाने की हिदायत दे दी गई थी।
घोड़ों को अलग कमरे में रखा गया था। बावजूद इसके कुछ दिन तक परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य की निगरानी की जाएगी।
अंग्रेजों के समय से है मौत का नियम
ग्लैंडर्स से संक्रमित घोड़ों को मारने का नियम अंग्रेजी शासनकाल से चला आ रहा है। दरअसल, यह बीमारी एक से दूसरे पशु में तेजी से ट्रांसफर होती है।
अंग्रेजी शासनकाल में फौज में शामिल घोड़ों में एक को बीमारी हुई तो कई घोड़ों को अपनी चपेट में ले लेती थी। तभी ग्लैंडर्स एंड फारसी एक्ट में घोड़ों को मारने का अधिकार दे दिया गया था। ताकि बीमारी की जानकारी मिलते ही संक्रमित घोड़े को मारकर फौज के अन्य घोड़ों को बचा लिया जाए।
घोड़े मालिक को मिलेगा मुआवजा
घोड़ों को मारने की वजह से उसके मालिक को आर्थिक नुकसान न हो, इसके लिए उसे मुआवजा दिया जाएगा। नए आदेशों के मुताबिक अब एक घोड़े की मौत पर मालिक को 25 हजार रुपये तक मुआवजा दिए जाने का प्रावधान है। इस मामले में भी पशुपालन विभाग ने मुआवजे की प्रक्रिया शुरू कर दी है।