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क्यों नहीं मिला जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक का दर्जा?

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जामा मस्जिद एक प्राचीन और मशहूर एतिहासिक स्मारक है लेकिन इसे संरक्षित स्मारक का दर्जा देने में भारत सरकार ने ही नहीं बल्कि ब्रिटिश काल में भी जरूरत नहीं समझी गई। इस तथ्य का खुलासा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने हाईकोर्ट के समक्ष किया है।
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मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी व न्यायमूर्ति आरएस एंडलॉ की खंडपीठ ने जामा मस्जिद में अवैध निर्माण व कब्जों को लेकर दायर याचिका पर एएसआई के अलावा अन्य पक्षों द्वारा जवाब दाखिल न करने पर नाराजगी जताई है।

बुधवार को अदालत ने दिल्ली सरकार, उत्तरी दिल्ली नगर निगम, वक्फ बोर्ड, डीडीए व दिल्ली पुलिस के अलावा शाही इमाम को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए सुनवाई 12 अगस्त तय की है।
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ब्रिटिश काल में भी उठी थी मांग लेकिन पूरी नहीं हुई

एएसआई ने अपने जवाब में कहा कि ब्रिटिश काल के समय के प्रख्यात पुरातत्व विशेषज्ञ सैयद जफर हसन ने भी जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित न करने को कहा था।

एएसआई ने कहा कि इसी संबंध में जामा मस्जिद का 1911 में सर्वे कराया गया था और यह तय किया गया था कि जामा मस्जिद ऐतिहासिक महत्व है लेकिन केंद्रीय संरक्षित स्मारक के रूप में अधिसूचित नहीं किया जाए।

इससे पूर्व एएसआई ने अपने जवाब में कहा कि 20 अक्तूबर 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शाही इमाम को पत्र लिखकर बताया था कि उन्होंने संस्कृति मंत्रालय व एएसआई जामा मस्जिद में मरम्मत का काम तय वक्त में पूरा करने का निर्देश दिया है।
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ये है मामला

प्रधानमंत्री ने यह भी बताया था कि संस्कृति मंत्रालय ने यह तय किया है कि जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित नहीं किया जाएगा। एएसआई ने बताया कि जामा मस्जिद संरक्षित स्मारक नहीं है।

लेकिन इसके ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए एएसआई 1956 से समय-समय पर इसके रखरखाव का काम अपने खर्च पर कराता आया है।

सुनवाई के दौरान जामा मस्जिद क्षेत्र निवासी याची सुहैल अहमद खान के अधिवक्ता ने खंडपीठ को बताया कि यह मामला वर्षों से लंबित है और मस्जिद में शाही इमाम ने अवैध निर्माण के अलावा कब्जे कर रखे हैं। ऐसे में जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित करने के अलावा सभी पक्षों को कब्जे हटाने का निर्देश दिया जाए।
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