फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मिशन मोदी के लिए कौन संभालेगा बीजेपी का मैनेजमेंट?

Tue, 18 Mar 2014 09:22 AM IST
नवनीत शरण/अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
लोकसभा के चुनावी दंगल में भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष समेत कई दिग्गज नेता उतर गए हैं। यहां तक कि स्टार प्रचारक भी मैदान में हैं। ऐसे में दिल्ली के चुनाव प्रबंधन और प्रचार का जिम्मा संभालने वालों की किल्लत दिख रही है।
विज्ञापन


सवाल उठने लगा है कि दिल्ली में चुनाव का प्रबंधन कौन संभालेगा? क्या सभी प्रत्याशी अपने-अपने दम पर ही चुनावी समर में पार करके नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाएंगे।

दिल्ली का कोई भी चुनाव देश के लिए अहम होता है। लिहाजा यहां के छोटे-बड़े सभी चुनाव में राष्ट्रीय नेताओं का दखल होता है इसलिण् चुनाव के दौरान पैनी निगाह रखना जरूरी है। लेकिन लोकसभा चुनाव में दिल्ली में चुनाव लड़वाने की जिम्मेदारी कौन संभालेगा, इसे लेकर अब चर्चा तेज हो गई है।
विज्ञापन

बीजेपी को खलेगी गोयल की नामौजूदगी?

दिल्ली विधानसभा चुनाव की अगर बात करें तो पूरी जिम्मेदारी चुनाव प्रभारी नितिन गडकरी पर थी। राष्ट्रीय नेताओं ने अपना पूरा दमखम लगा दिया था। बावजूद इसके पार्टी सरकार बनाने का जादुई आंकड़ा नहीं जुटा पाई।

इस बार नितिन गडकरी भी दिल्ली के चुनाव में अपनी भूमिका नहीं निभा सकेंगे क्योंकि वे खुद चुनाव लड़ रहे हैं। इसी तरह भाजपा नेता अरुण जेटली की भूमिका दिल्ली के चुनाव में नहीं होगी। सुषमा स्वराज भी स्टार प्रचारक की भूमिका में नहीं होंगी।

लिहाजा यहां चुनाव का सारा प्रबंधन खुद ही प्रत्याशियों को करना पड़ सकता है। उधर, दिल्ली की राजनीति से लंबे समय से जुड़े और दो बार चांदनी चौक से सांसद रह चुके विजय गोयल भी दिल्ली की राजनीति से अलग हो गए हैं, जिसका असर चुनाव में दिख सकता है। हालांकि पार्टी सूत्रों का कहना है कि ऐसी स्थिति में भाजपा का राष्ट्रीय कार्यालय चुनाव प्रबंधन संभालेगा।

राजधानी में बढ़ रहा है वैश्यों का प्रतिनिधित्व

दिल्ली का राजनीतिक मिजाज बदलने लगा है। कभी यहां की राजनीति पंजाबी नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती थी, लेकिन अब वैश्य नेता प्रभावी होने लगे हैं। कांग्रेस, भाजपा व आम आदमी पार्टी में भी की-पोस्ट पर वैश्य नेता ही काबिज हैं।

पुराने दौर की अगर बात करें तो भाजपा में पंजाबी लॉबी काफी हावी थी। मदन लाल खुराना और प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा का प्रदेश की राजनीति में दबदबा था। तीन बार से प्रदेश अध्यक्ष वैश्य वर्ग से ही बन रहे हैं।

विजेंद्र गुप्ता, विजय गोयल और अब डॉ. हर्षवधन, तीनों लगातार की-पोस्ट पर बने रहे। विधानसभा चुनाव के दौरान भी वैश्य समाज से जुड़े डॉ. हर्षवर्धन को बतौर मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किया गया। लोकसभा चुनाव में भी वह चांदनी चौक लोकसभा से मैदान में हैं।
विज्ञापन

हर पार्टी ने अपनाया ये फैक्टर

कांग्रेस की अगर बात करें तो विधानसभा चुनाव से पहले तक प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी वैश्य समाज से जुड़ जेपी अग्रवाल के पास थी। हालांकि, विधानसभा चुनाव के बाद जिम्मा अरविंदर सिंह को दिया गया।

आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल वैश्य समाज से ही हैं। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता व चांदनी चौक लोकसभा के प्रत्याशी आशुतोष भी वैश्य समाज से ही जुड़े हैं। लिहाजा, इस वर्ग का प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ रहा है।

पिछले दिनों जब भाजपा नेता डॉ. हषवर्धन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा रहा तो पार्टी में यह चर्चा रही कि ऐसा कभी नहीं होता है कि विधानसभा नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष एक ही समाज से हों। परंपरा रही है कि जब नेता प्रतिपक्ष पंजाबी होता है तो अध्यक्ष की कुर्सी वैश्य समाज का कोई नेता संभालता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें