गाजियाबाद के चौराहों पर माफियाराज है। आरटीओ और पुलिस के संरक्षण में दबंग
ठेकेदार चौराहों से रोजाना हजारों रुपये कमाते हैं। खुलेआम वसूली की जाती
है।
वसूली के रेट भी माफियाओं द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। अस्पतालों,
बस स्टैंडों और प्रमुख चौराहों पर लगने वाले ठेले, फड़ और रेहड़ी को भी
वसूली के बल पर जाम लगाने का अधिकार मिलता है।
माफियाओं की दबंगई ऐसी है कि
वसूली का विरोध करने वाला यहां कारोबार तो दूर, यहां से होकर निकल भी नहीं
सकता। अमर उजाला ने शहर के प्रमुख चौराहों पर लगने वाले जाम और इसका कारण
बने ठेले-आटो की स्थिति का जायजा लिया।
यहां है दबंगों का कब्जा
महानगर में यूं तो सभी चौराहे ठेले-रेहड़ी और आटो वालों के कब्जे में हैं, लेकिन पुराना बस अड्डा, रेलवे रोड, विजयनगर चौराहा, घंटाघर चौराहा, अस्पताल गेट, मालीवाड़ा चौराहा, अशोक नगर चौराहा, विवेकानंद चौक, रमतेराम रोड और हापुड़ चुंगी पूरी तरह इनके काबू में हैं। यहां पर लगने वाले जाम का मुख्य कारण इनका जमावड़ा है।
यह है तरीका
माफिया के कब्जे में सड़कों की आधी चौड़ाई रहती है। वाहनों को चलने के लिए सड़कों की आधी चौड़ाई ही मिलती है। आधी पर स्थायी रूप से ठेले-आटो खड़े कराए जाते हैं।
कथित ठेकेदार द्वारा खड़े कराए गए इन वाहनों-आटो को पुलिस-परिवहन का कोई अफसर नहीं छेड़ता है। इसके अलावा बाकी सड़क पर भी घुमंतू ठेले वाले चक्कर लगाते हैं।
ऐसे होती है उगाही
कथित ठेकेदार आटो वालों से 50 रुपये, स्टाल लगाने वालों से 60, फड़ लगाने वालों से 70, ठेली लेकर निकलने वालों से 20 रुपये, डग्गामार टैक्सियों से 30 रुपये और बसों से 50 रुपये वसूलते हैं।
इनके द्वारा अस्पतालों के मुख्य गेट के बराबर में और सामने लगाने वालों से दस रुपये ज्यादा वसूले जाते हैं, जबकि थोड़ी दूरी पर खड़े होने से कम रुपये लेते हैं। उगाही करने वाले कर्मचारियों की भी ड्यूटी बदलती रहती है।
एक शिफ्ट वाले लड़के दोपहर दो बजे तक उगाही करते हैं, जबकि दूसरी शिफ्ट वाले रात में 11 बजे तक। यदि कोई इनसे उलझता है तो दबंग सामने आ जाते हैं।
ठेकेदारों से अफसरों का मौन समझौता होता है। सूत्रों की मानें तो उगाही का ठेका छोड़ा जाता है। पुराने बस अड्डे से ही 50 हजार रुपये रोज की उगाही होती है। इसका आपस में बंटवारा कर लेते हैं।