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Delhi NCR News: पश्चिमी दिल्ली की हस्तसल मीनार उपेक्षा का शिकार, पहचान बचाने को संघर्ष

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अनियोजित बस्तियों के बीच इतिहास और विकास की जद्दोजहद में शाहजहां का शिकारगाह
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ज्योति सिंह
नई दिल्ली। पश्चिमी दिल्ली में स्थित ऐतिहासिक हस्तसल मीनार अपनी पहचान और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। मुगल बादशाह शाहजहां के शिकारगाह से जुड़ी यह मीनार कभी शाही शान का प्रतीक थी। संकरी गलियों और अनियोजित बस्तियों के बीच यह धरोहर अब उपेक्षा की मार झेल रही है।
सत्रहवीं सदी में शाहजहां द्वारा निर्मित यह मीनार लगभग 17 मीटर ऊंची है। दिल्ली अर्बन आर्ट्स कमीशन के दस्तावेज में इसे 1650 के दशक में बनी तीन मंजिला मीनार बताया गया है। कभी इसके ऊंचे हिस्से से दूर तक का इलाका दिखाई देता था, जहां शाही काफिले शिकार के बाद रुकते थे। समय के साथ शहर इसके चारों ओर फैल गया, जिससे इसकी पहचान सिमट गई। लोग इसे 'मिनी कुतुब मीनार' भी कहते हैं, लेकिन इसकी चमक फीकी पड़ गई है। दीवारों पर लिखे नाम, अतिक्रमण और खराब रखरखाव इसकी दुर्दशा के प्रमुख कारण हैं। 2019 की एक रिपोर्ट में भी इसकी उपेक्षा और आसपास बने मकानों का जिक्र किया गया था। स्थानीय निवासी राहुल ने कहा कि उन्हें बचपन से यही दिखता आया है, पर इसके इतिहास के बारे में कम लोग जानते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि यदि ऐसी धरोहरों को समय पर संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां उन्हें केवल किताबों में ही पढ़ेंगी।
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इतिहास और लोककथाएं
इतिहासकारों में इसके निर्माण को लेकर एकमत नहीं है। एक मत इसे शाहजहां के शिकारगाह से जोड़ता है। वहीं, स्थानीय लोककथाएं इसे पृथ्वीराज चौहान और यहां तक कि पांडवों से भी जोड़ती हैं। लाल पत्थर और ईंटों से बनी यह मीनार कभी पांच मंजिला और ऊपर छतरी वाली बताई जाती थी, पर अब केवल तीन मंजिलें ही दिखती हैं।
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संरक्षण के प्रयास
दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग ने हाल के वर्षों में इसके संरक्षण के लिए कदम उठाए हैं। विभाग ने हस्तसल गांव स्थित मीनार के लिए नई ईंट की चारदीवारी, लाल बलुआ पत्थर की फर्श और अन्य कार्यों के लिए निविदाएं जारी की थीं। यह कार्य विभाग की वेबसाइट पर भी दर्ज है। हालांकि, संरक्षण केवल पत्थरों की मरम्मत नहीं होता, बल्कि उसकी कहानी को बचाना भी जरूरी है।
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