मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को दिव्यांगता की सुविधा पाने के लिए लंबा इंतजार करना होगा। इन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल में आईक्यू जांच की तारीख डेढ़ से दो साल बाद की मिल रही है।
अस्पताल के मनोरोग विभाग की जांच से ही तय होता है कि मनोरोग विकार के आधार पर बच्चे को प्रमाण पत्र देना है या नहीं। इसी प्रमाण पत्र के आधार पर स्कूल में दाखिले के साथ दिव्यांग बच्चों को मिलने वाली दूसरी सुविधाएं भी मिलती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो आईक्यू जांच से स्पष्ट हो जाता है कि बच्चा किस स्तर तक मानसिक रोगी है। जांच में डॉक्टरों व आईक्यू टूल की मदद से बच्चे के दिमाग का परीक्षण किया जाता है। डॉक्टरों की मानें तो इसके लिए मनोरोग विशेषज्ञों की जरूरत होती है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल का यह केंद्र चुनिंदा सेंटरों में से एक है। यहां बड़ी संख्या में बच्चे आते हैं। बच्चों की संख्या ज्यादा होने के कारण लंबी तारीख दी जा रही है। इस संबंध में अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अजय शुक्ला का कहना है कि उन्हें इस विषय में पूरी जानकारी नहीं है। वहीं इस संबंध में जानकारी लेने के लिए विभाग में नैदानिक मनोविज्ञान के प्रभारी सत्यम से संपर्क नहीं हो पाया।
दाखिले के लिए परेशान हैं बच्चे
दिल्ली के स्कूलों में जल्द ही बड़ी कक्षाओं के लिए दाखिले शुरू होने वाले हैं। इसके लिए विशेष बच्चों को प्रमाण-पत्र की जरूरत होगी। ऐसे में परिवार परेशान हैं कि जांच यदि एक साल बाद होगी तो प्रमाण-पत्र भी देर से मिलेगा। फिर दाखिला कैसे हो पाएगा। विभाग में अपने बच्चे को दिखाने आई कोमल ने बताया कि उनके बच्चे को आईक्यू जांच के लिए 13 नवंबर 2025 की सुबह 10 बजे बुलाया गया है। जांच में देरी के कारण प्रमाण पत्र नहीं मिल पाएगा। ऐसे में बच्चे को दूसरी सुविधाएं भी नहीं मिलेंगी। उनका कहना है कि वह गरीब परिवार से है। यदि प्रमाण पत्र मिल जाता है तो उसके आधार पर बच्चे को दूसरी सुविधाएं भी मिलनी शुरू हो जाएंगी।
ऐसे होती है जांच
मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की आईक्यू परख के लिए विशेष विधि का इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत पहले मनोरोग विशेषज्ञ बच्चों से बात करते हैं। उनकी बात व समझ का पता लगाते हैं। इसके बाद कुछ वैज्ञानिक टूल का इस्तेमाल होता है। इसमें देखा जाता है कि बच्चा उक्त टूल का इस्तेमाल व उपयोग किस प्रकार से कर रहा है। हर इस्तेमाल पर अंक दिए जाते हैं। बाद में अंगों के योग के आधार पर यह तय होता है कि बच्चा सरकार की तरफ से मानक पर खरा उतरता है या नहीं। यदि बच्चे की समझ कमजोर पड़ती है तो जांच रिपोर्ट के आधार पर दिव्यांगता का प्रमाण पत्र बनता है।
स्टाफ की कमी
सूत्रों की मानें तो डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के सेंटर में आईक्यू की जांच करने वाले स्टाफ की भारी कमी है। लंबे समय से जांच करने वाले स्टाफ की मांग की जा रही है, लेकिन इन दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई। दिल्ली-एनसीआर में यह सुविधा कुछ चुनिंदा जगहों पर ही है। ऐसे में यहां कार्य दिवस पर काफी बच्चे जांच के लिए आवेदन करवाते हैं। आएमएल के क्लीनिक्ल मनोरोग विभाग में हर सप्ताह करीब 20 बच्चे आते हैं, ज्यादातर गरीब व मध्यम परिवार से होते हैं। सूत्रों का कहना है कि स्टाफ की संख्या बढ़ने पर जांच में गति आएगी और बच्चों को दी जा रही लंबी तारीख में कमी होगी।