जेएनयू के कन्वेंशन सेंटर में आयोजित वेदांत सम्मेलन में बोलते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सनातन और हिंदू का उल्लेख करने पर हैरान करने वाली प्रतिक्रिया आना दुखद है। वेदांत और सनातनी ग्रंथों को बताकर नकारना विकृत औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक है। वेदांत के ज्ञान की समाज पहुंच सुनिश्चित करने के लिए कक्षाओं तक लाने का आह्वान किया है।
भारत में सनातन और हिंदू का उल्लेख करने पर हैरान करने वाली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। यह काफी दुखद है। इन शब्दों के अर्थ को समझने के बजाए लोग तुरंत प्रतिक्रिया देने लगते हैं। हमारे देश में वेदांत और सनातनी ग्रंथों को पश्चगामी बताकर नकारना विकृत औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक है। यह बातें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के 27वें अंतरराष्ट्रीय वेदांत सम्मेलन में कहीं।
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जेएनयू के कन्वेंशन सेंटर में आयोजित वेदांत सम्मेलन में बोलते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता का कुकृत्यों को ढाल देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे तत्वों का पर्दाफाश करना हर भारतीय का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि जगह-जगह युद्ध, निरंतर बढ़ते तनाव और अशांति हर हिस्से में मौजूद हैं। यह न केवल मनुष्यों के बीच है बल्कि अन्य जीवों के बीच भी है।
धनखड़ ने कहा कि डिजिटल गलत सूचनाएं, संसाधनों का अत्यधिक दोहन ये अप्रत्याशित चुनौतियां हैं जिनके लिए तकनीकी समाधान के साथ-साथ नैतिक ज्ञान और व्यावहारिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो वेदांत दर्शन की गहरी समझ से उत्पन्न हो सकता है।
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उपराष्ट्रपति ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटना होगा। उन्होंने वेदांत ज्ञान की समाज तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए इसे कक्षाओं तक लाने का आह्वान किया। वेदांत अतीत का अवशेष नहीं है, बल्कि भविष्य का ब्लूप्रिंट है।
उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति और संवाद सभ्यता के लिए आवश्यक हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति का अधिकार होना चाहिए। संवाद, बहस, चर्चा, विचार-विमर्श को विघटन और संकट के हमले में से बाहर लाने की आवश्यकता है। यह कि मैं अकेला सही हूं, यह अज्ञानता की सीमा है। यह अत्यधिक अंहकार को दर्शाता है। सम्मेलन में जेएनयू की कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धुलीपुडी पंडित, अमेरिका के हवाई विश्वविद्यालय के मानद प्रोफेसर अरिंदम चक्रवर्ती समेत अन्य लोग उपस्थित रहे।