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राफेल सौदे का अनसुलझा रहस्य

Mon, 31 Dec 2018 08:02 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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रणदीप सुरजेवाला - फोटो : self
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पांच राज्यों के चुनावों में किसान, बेरोजगारी, जीएसटी के साथ राफेल घोटाले का मुद्दा भी गर्माया रहा। यह सवाल भी उठा कि क्या गोपनीयता के नाम पर कोर्ट व देश की आंखों पर पट्टी बांधी गई? यह बात अदालत के निर्णय में दर्ज बुनियादी खामियों से साफ है।

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला राफेल मामले में सीएजी की रिपोर्ट के इर्दगिर्द घूमता है। न्यायाधीशों ने कैग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि रिपोर्ट संसद व संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) द्वारा जांच ली गई है। इसी आधार पर सरकार को दोषमुक्त करार दिया। उन्होंने मान लिया कि कैग जैसी संवैधानिक संस्था ने राफेल के मामले में सभी पहलुओं की गहन जांच कर ली है। संसद व पीएसी ने भी कैग रिपोर्ट को परख लिया है। पर सच इसके विपरीत है। मोदी सरकार ने यह टाइपिंग संबंधी गलती है। जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व पीएसी के चेयरमैन मल्लिकार्जुन खड़गे ने खुलासा किया कि राफेल में न तो कैग रिपोर्ट बनी, और न ही पेश हुई।

मोदी सरकार के भ्रामक तथ्यों की सूची यहां समाप्त नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट ने दसॉल्ट एविएशन व रिलायंस के समझौते को इस आधार पर उचित ठहराया कि दोनों कंपनियों के बीच ऐसा समझौता साल 2012 से लगातार जारी है। लेकिन यह तथ्य जो सच्चाई के नजदीक है ही नहीं। रिलायंस डिफेंस लिमिटेड का गठन तो 28 मार्च 2005 को हुआ। जो मोदी द्वारा राफेल खरीदने की घोषणा से सिर्फ 12 दिन पहले था। तीसरा फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने खुलासा किया कि अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी को ऑफसेट पार्टनर चुनने की शर्त मोदी सरकार ने रखी थी। इसे अदालत ने यह कहकर खारिज कर दिया कि सभी पक्षों ने इस बयान को नकार दिया है।
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सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कहा कि दसॉल्ट एविएशन द्वारा रिलायंस के ऑफसेट पार्टनर के चयन में कोई सरकारी हस्तक्षेप नहीं था। परंतु कोर्ट को इस बारे में अंधेरे में रखा गया कि रक्षा खरीद प्रणाली, 2013 में यह शर्त पहली बार 5 अगस्त, 2015 को एक संशोधन से जोड़ी गई थी, जो प्रधानमंत्री द्वारा पेरिस में राफेल विमान खरीदने की घोषणा को लगभग चार महीने बाद थी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी कंपनी एचएएल का राफेल सौदे से जुड़ाव नहीं था। परंतु सरकार ने कोर्ट से यह छिपा लिया कि एचएएल एवं डसॉल्ट के बीच तो 13 मार्च, 2014 को ही ‘वर्कशेयर एग्रीमेंट’ हो चुका था। यह बात डसॉल्ट के सीईओ ने भी मानी थी व इस समझौते की पुष्टि देश के विदेश सचिव ने भी की। फिर यह बात सुप्रीम कोर्ट से क्यों छुपाई गई? क्या यह सब एचएएल से 30 हजार करोड़ रुपये का ठेका छीनकर निजी कंपनी को सौंपने की साजिश थी।

फ्रांस सरकार की सोवरेन गारंटी के बिना ही राफेल सौदा करने के बारे में कानून मंत्रालय द्वारा 12 दिसंबर, 2015 व 23 अगस्त, 2016 को उठाई गई आपत्तियों व राय को अदालत के सामने पेश ही नहीं किया गया।

कोर्ट को गुमराह किया कि डिफेंस एक्लिजिशन काउंसिल (डीएसी) ने खरीद को अनुमति दे दी है। सच्चाई यह है कि डीएसी ने खरीद की जरूरत के बारे में निर्णय 13 मई, 2015 को लिया था, पर प्रधानमंत्री ने तो उस निर्णय के 33 दिन पहले ही, यानि 10 अप्रैल, 2015 को 36 राफेल लड़ाकू जहाज खरीदने की घोषणा कर दी थी। अंत में, न तो कोर्ट और न ही जनता को बताया गया कि राफेल लड़ाकू जहाजों की संख्या 126 से घटाकर 36 कर राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ क्यों किया गया?

ये छोटी-मोटी गलतियां नहीं, बल्कि कोर्ट एवं देश को गुमराह करने का सोचा समझा एजेंडा है। मोदी सरकार को दो सीख लेनी चाहिए: पहला जालसाजी भरे तथ्यों से प्राप्त किया गया फैसला आधारहीन है। और दूसरा, केवल बयानबाजी और इश्तिहारबाजी सच को नहीं छिपा सकती है। सत्यमेव जयते।

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