मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति अनीश दयाल की खंडपीठ ने सिनेमैटोग्राफ अधिनियम की धारा 6 के तहत केंद्र सरकार को अपने संशोधन अधिकारों का उपयोग कर फिल्म की जांच करने का निर्देश दिया। फिल्म की रिलीज शुक्रवार, 11 जुलाई को प्रस्तावित थी। खंडपीठ ने कहा कि केंद्र सरकार स्वतः संज्ञान लेने या किसी शिकायतकर्ता के आवेदन पर फिल्म के प्रमाणन के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है। कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ताओं ने इस कानूनी उपाय का उपयोग नहीं किया था। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग कर हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन याचिकाकर्ताओं को पहले केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए।
कोर्ट ने आदेश दिया, हम याचिकाकर्ता को दो दिनों के भीतर केंद्र सरकार से संपर्क करने की अनुमति देते हैं। यदि याचिकाकर्ता केंद्र सरकार से संपर्क करते हैं, तो वे अंतरिम उपायों के लिए भी अनुरोध कर सकते हैं। यदि याचिकाकर्ता संशोधन याचिका दायर करते हैं, तो केंद्र सरकार को निर्माता को सुनवाई का अवसर देने के बाद एक सप्ताह के भीतर इसका निर्णय करना होगा। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि फिल्म के खिलाफ अंतरिम राहत के अनुरोध पर भी विचार किया जाए। तब तक, फिल्म की रिलीज पर रोक रहेगी। खंडपीठ ने कहा, चूंकि हम याचिकाकर्ता को धारा 6 के तहत संशोधन उपाय का उपयोग करने के लिए कह रहे हैं, हम आदेश देते हैं कि फिल्म की रिलीज पर रोक रहेगी।
सेंसर बोर्ड का दावा आपत्तिजनक हिस्से हटाए
सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) ने बुधवार को कोर्ट को सूचित किया था कि फिल्म के कुछ आपत्तिजनक हिस्सों को हटा दिया गया है। कोर्ट ने निर्माता को फिल्म और उसके ट्रेलर की स्क्रीनिंग की व्यवस्था करने का निर्देश दिया था, जिसमें याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल और सीबीएफसी के लिए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा मौजूद थे।
याचिकाकर्ताओं की अपील
मौलाना अरशद मदनी ने अपनी याचिका में दावा किया कि फिल्म मुस्लिम समुदाय को बदनाम करती है और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा सकती है। याचिकाकर्ताओं ने फिल्म पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की थी, जिसके जवाब में कोर्ट ने केंद्र सरकार को सामग्री की जांच करने का निर्देश दिया।