स्पेशल मैरिज एक्ट (एसएमए) में शादी की अनुमति के लिए दो महिलाओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इनका कहना है कि वह आठ साल से साथ रह रही हैं और एक दूसरे से प्रेम करती हैं लेकिन शादी नहीं कर सकतीं क्योंकि दोनों महिलाएं हैं। ऐसी ही एक अन्य याचिका दो पुरुषों ने दायर की है। इन्होंने अमेरिका में शादी कर ली थी लेकिन इनके विवाह का भारतीय कॉन्स्यूलेट ने विदेशी विवाह अधिनियम 1969 में पंजीकरण नहीं किया था क्योंकि दोनों पुरुष थे।
न्यायमूर्ति नवीन चावला के समक्ष यह दोनों याचिकाएं बृहस्पतिवार को सुनवाई के लिए आईं। न्यायमूर्ति चावला ने इन याचिकाओं को सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश रजिस्टरी को दिया है। मुख्य न्यायाधीश की पीठ पहले से ही सेम सेक्स मैरिज को हिंदू विवाह अधिनियम तथा विशेष विवाह अधिनियम के तहत मान्यता की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।
इन याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी, अधिवक्ता अरुंधति काटजू, गोविंद मनोहरन तथा सुरभि धर पैरवी कर रहे हैं। याचिका दायर करने वाली 47 तथा 36 वर्षीय महिलाओं ने कहा है कि संयुक्त बैंक खाता खोलना, फैमली हैल्थ पॉलिसी लेना या आवास का दस्तावेज लेने जैसे मामूली चीजें लेने में भी उन्हें भारी दिक्कत होती है।
याचिका में कहा गया है कि शादी केवल दो लोगों का नहीं बल्कि दो परिवारों का मिलन है। इससे कई अधिकार भी जुड़े हैं। वहीं बिना शादी का जोड़ा कानून की नजर में अजनबी है। संविधान का अनुच्छेद 21 दो व्यक्तियों को अपने पसंद के व्यक्ति से विवाह का सुरक्षित अधिकार देता है और यह सेम सेक्स वाले जोड़ों पर भी उसी तरह लागू होता है जैसे दो अलग सेक्स वाले जोड़े पर होता है।
यह दोनों महिलाएं उस टीम का हिस्सा हैं जिसने उत्तर भारत में बच्चों तथा किशोरों में सीखने की समस्या तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेष क्लीनिक बनाए हैं। इन्होंने एसएमए को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है क्योंकि यह दो समान सेक्स वाले व्यक्तियों की शादी की अनुमति नहीं देता।
इन महिलाओं ने मांग की है कि एसएमए को सभी जोड़ों पर, उनके केस में भेद किए बिना, लागू होना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने एसडीएम कालकाजी को उनके विवाह का पंजीकरण एसएमए में करने का निर्देश देने की मांग की है।
वहीं दूसरी ओर अन्य याचिका दायर करने वाले पुरुष जोड़े का कहना है कि वह 2012 से साथ हैं और उन्होंने 2017 में शादी की की थी। उनके विवाह को मान्यता प्राप्त नहीं है, इसलिए कोरोना महामारी के दौरान वह दंपती के तौर पर भारत आने और परिवार के साथ रहने के अधिकार से वंचित हो गए। उनके विवाह को मान्यता न मिलना उनके साथ भेदभाव है।