इशरान खान भले ही मुसलमान हैं लेकिन इस बार की दिवाली से उन्हें काफी उम्मीद थी। उनके पिता सरकारी नौकरी में थे। जिंदगी भर नौकरी के बाद रिटायर होने पर उन्हें प्रॉविडेंट फंड के तौर पर कुछ रकम मिली थी।
उनका बेटा इशरान अपने बिजनेस को आगे बढ़ाना चाहता था। दिवाली इसके लिए सबसे अच्छा मौका था। उसके कहने पर इशरार के पिता ने अपनी जिंदगी भर की कमाई बेटे के बिजनेस में लगा दी।
इस बार इशरान भी जोश में थे। उन्होंने अपनी अब तक की पूरी जमापूंजी और पिता की जिंदगी भर की कमाई कपड़े की अपनी दुकान में माल भरने और दुकान के रंग-रोगन में लगा दिया।
इतना ही नहीं इशरान ने कुछ पैसे अपने दोस्तों से उधार भी लिए थे। इशरार इस बार दिवाली का इंतजार किसी हिंदू परिवार से भी ज्यादा उत्सुकता से कर रहे थे।
(फोटो: इशरान खान)
नींद खुलने से पहले पहुंची बर्बादी की खबर
त्रिलोकपुरी के ब्लॉक 27 में कपड़े की उनकी सबसे बड़ी दुकान थी। दिवाली के दिन हुई दुकानदारी से वह और उनका परिवार खुश था। कुछ सामान बिका था और काफी कुछ बिकना बाकि था।
त्रिलोकपुरी में दिवाली की शाम कुछ लड़कों के बीच झड़प हुई। थोड़ा बहुत पथराव भी हुआ। इशरान इन सबसे बेफिक्र थे। लेकिन एक दिन बाद मामला बढ़ गया और उसने दंगें की शक्ल ले ली।
दिवाली के एक दिन बाद शनिवार की अलसुबह चार बजे दंगाइयों ने उनकी चमकती-दमकती दुकान को आग के हवाले कर दिया। शनिवार को इशरान की नींद खुलती इससे पहले उन्हें इस बर्बादी की खबर मिली।
इशरान और उनका पूरा परिवार जैसे मातम के गम में डूब गया। इस दंगें में उनकी और उनके पिता की जिंदगी भर की कमाई जल कर खाक हो चुकी थी।
एक ही दिन छह दुकानों में लगी आग
जिस दिन इशरान की दुकान को आग लगाई गई उसी दिन उनके ही ब्लॉक में दो और दुकानों को आग लगाया गया था। इसमें एक बर्तन की दुकान थी और एक मीट की।
चौंकाने वाली बात ये है कि उसी दिन और लगभग उसी समय त्रिलोकपुरी के ब्लॉक 29 में तीन और दुकानों को जला कर खाक कर दिया गया था। माना जाता है कि ये सभी दुकानें एक ही संप्रदाय के लोगों की थी।
अपने दुख को व्यक्त करते हुए इशरान खान कहते हैं कि उनके साथ उनके छह बच्चे, पत्नि, पिता और विधवा बहन रहती हैं। इन सबकी जिंदगी इसी दुकान पर निर्भर थी। इतने बड़े परिवार का खर्चा अब कैसे चलेगा यह इशरार के लिए समझना मुश्किल हो रहा है।
(फोटो व तथ्य साभार: timesofindia.com)