एक बड़ी आईटी कंपनी में काम करने वाली किरन सखी को अपनी नौकरी छोड़ कर, अब देश की राजधानी में भीख मांगने को मजबूर होना पड़ा है। इसका कारण है उसके सहकर्मियों का उसे ताने मारना और उसके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करना क्योंकि वो एक ट्रांसजेंडर है।
किरन जो पंजाब विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में पोस्ट ग्रैजुएट है, उसे दो साल पहले अपनी नौकरी गंवानी पड़ी और अब वो गुजर-बसर के लिए भीख मांगती है। किरन का कहना है कि जिस कंपनी में वो काम करती थी उसने उसे ट्रांसजेंडर के रूप में अपनाने से को परेशानी नहीं थी।
किरन ने बताया लेकिन दो महीने बाद वो काम करने में असहज महसूस करने लगी। उस समय वो अपने जूनियरों के साथ काम नहीं कर पा रही थी। किरन उनके लिए हंसी का पात्र बन गई थी। इस वजह से 6 मार्च 2014 को जबरन उसे ये नौकरी छोड़नी पड़ी। हालांकि उसके एचआर और निदेशकों ने उसे काम करने के लिए प्रोत्साहित किया था।
'सेक्स वर्कर का भी काम करना पड़ा'
transgender kiran
- फोटो : ani
किरन ने बताया कि उसके जेंडर की वजह से वो मुश्किल से ही इंटरव्यू लेवल तक पहुंच पाती है। वो कहती है कि अब वो भीख भी मांगती है और नौकरी भी ढूंढ रही है।
किरन हिजड़ा समुदाय का भी शुक्रिया अदा करती है कि उन्होंने उसे अपने संरक्षण में लिया और उसे अपने पारिवारिक सदस्य की तरह रखा। किरन का कहना है कि नौकरी और शिक्षा के अभाव में अधिकतर ट्रांसजेंडर सेक्स वर्कर बनने या सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर होते हैं।
किरन ने अपनी मुश्किलों के बारे में बताते हुए कहा कि उसने सेक्स वर्कर के रूप में भी काम किया है और भीख भी मांगा है। किरन ने वो हर काम किया जिससे कि वो अपना जीवनयापन कर सके। किरन कहती है कि पहले उसकी ऐसी भावनाएं नहीं थी, पहले उसकी जिंदगी काफी आसान थी।
ट्रांसजेंडर बनने के बाद हुआ एहसास कि मुश्किल है जिंदगी
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किरन कहती है कि जब से वो ट्रांसजेंडर बनी है उसे एहसास हुआ है कि जिंदगी कितनी मुश्किल है। 'मैं भीख मांगती हूं लेकिन अगर देखें तो मैं खुश हूं।' बता दें कि अप्रैल 2014 में अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडरों को कानूनी रूप से तीसरे लिंग का दर्जा दिया है और उनके साथ सामान्य व्यवहार की भी बात कही है।
कोर्ट ने ट्रांसजेंडर समुदाय को हाशिए पर गया समुदाय माना है और सरकार को इनके लिए भी नीतियां बनाने को कहा है जिससे इनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति सुदृढ़ हो सके। इसका मतलब है कि हर तरह के सरकारी डॉक्यूमेंट चाहे वो बर्थ सर्टिफिकेट, पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस हो सबमें तीसरे जेंडर का उल्लेख हो।
इसके साथ ही पब्लिक सेक्टर के स्कूलों, कॉलेजों व नौकरियों में इनके लिए एक निश्चित संख्या में सीटें आवंटित की जाएं। हालांकि कोर्ट के इस आदेश का स्वागत हुआ था लेकिन अभी तक इस फैसले को पूरे देश में लागू नहीं किया जा सका है।
ट्रांसजेंडरों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि हमारे देश में कोर्ट के ही आदेश में काफी विरोधाभास दिखाई देता है क्योंकि एक तरफ तो अदालत ट्रांसजेंडरों को तीसरे लिंग का दर्जा देता है और दूसरी तरफ गे सेक्स बैन कर रखा है जो तीसरे लिंग के राइट टू सैक्शुअल रिलेशनशिप को हानि पहुंचाता है।