12 दिनों से अपनी मांगों के समर्थन में दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों के सब्र का बांध धीरे धीरे कमजोर होने लगा है। किसान नेताओं का कहना है केंद्र सरकार ने न तो कृषि बिलों को पारित करने से पहले किसी से राय ली।
किसानों की मांगों पर राज्यों में जब सुनवाई नहीं हुई तो दिल्ली का रुख किया। वार्ता के पांचवे दौर में भी कोई नतीजा नहीं निकलने से भारत बंद में बढ़ चढ़कर शामिल होने का निर्णय लिया है। माना जा रहा है कि मंगलवार की रात, किसानों और सरकार के बीच वार्ता के लिए निर्णायक होगी।
पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित देश के अलग अलग राज्यों से दिल्ली कूच करने वाले किसानों का कहना है कि कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग पर इतने लंबे समय के इंतजार के बाद आखिरकार कोई नतीजा क्यों नहीं निकल सका है। फिलहाल, बुधवार को एक बार फिर किसानों की केंद्र सरकार के साथ बैठक होगी। इसमें भी अगर कोई समाधान नहीं निकला तो किसानों ने भी ठान ली है कि अपना हक लिए बगैर नहीं लौटेंगे।
पंजाब और हरियाणा के किसान न केवल छह महीने के राशन, ट्रैक्टर और बिस्तर के साथ पहुंचे हैं। बल्कि रसद के अलावा सभी के पास रुपये भी हैं ताकि उन्हें आंदोलन के दौरान किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। लगातार मिलते समर्थन से किसानों की स्थिति और सुदृढ़ हो रही है और किसान अपनी मांगों से पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे हैं।
संशोधन नहीं हैं संभव
किसान नेताओं का यह भी कहना है कि आखिरकार कोरोना काल में कृषि बिलों को संसद में पास करने की क्या जल्दी थी। यह कोई अंतरराष्ट्रीय मामला नहीं था, जिसपर बगैर मशविरा निर्णय ले लिया गया। उन्होंने कृषि कानूनों की कमियां बताते हुए कहा कि अगर इसमें संशोधन किया जाए तो कुछ बचेगा ही नहीं।