दुनिया में कोई भी गालिब पर नई किताब लिखी जाती है या शोध छपता हैं तो वो इस लाइब्रेरी में मंगाए जाते हैं। इन्हें पढ़ने के लिए भारी संख्या में युवा यहां हरदिन आते हैं। गालिब प्रेमी और शोधार्थी सोहेल हाशमी बताते हैं कि आप चलते-चलते गौर करें तो अमूमन ज्यादातर तुकबंदियां गालिब से जोड़ दी हैं। ऐसा उनके साथ ही होता है, जो जन मानस में बसे होते हैं। असल में, गालिब की नजर में हर एक शख्स का तर्जुबा शामिल है। उन्होंने समाज के हर पहलू का देखा और अपनी कलमबंद किया। तभी मुद्दतों बात वह आज भी हम सबमें जिंदा हैं।
गालिब पर छपी किताबों का हो रहा अनुवाद
गालिब इंस्टीट्यूट की ओर से गालिब का दीवान को हाल ही में पंजाबी में छपवाया गया है। कन्नड भाषा में अनुवाद का काम चल रहा है, जल्द ही बंगाली, असमी, मराठी और गुजराती भाषा में भी इसका अनुवाद होगा। इसके अलावा गालिब का काव्य संग्रह का गुजराती, मराठी, बंगाली और असमी भाषा में अनुवाद कराने की तैयारी चल रही है। डॉ इद्रीस अहमद ने बताया कि मंगलवार को सुबह 10 बजे निजामुद्दीन इलाके में स्थित गालिब की मजार पर फूल चढ़ाया जाएगा और दीये जलाए जाएंगे। उनकी मजार को फूलों से सजाया जाएगा।
आज है गालिब का जन्मदिन
मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था। उनका पूरा नाम मिर्जा असद उल्लाह बेग खां उर्फ गालिब था। बचपन से ही उन्हें कविताएं और शायरी का शौक था, महज 11ं साल की उम्र से ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। गालिब ने कई जगह काम किया। लाहौर, जयपुर और दिल्ली के बाद वह आगरा आ गए और वहीं रहने लगे। गालिब का निधन 15 फरवरी 1869 को हुआ, लेकिन आज भी मिर्जा गालिब की शायरी के बिना इश्क की दुनिया अधूरी है। इस शायर का आकर्षण उर्दू प्रेमियों के बीच इस कदर है कि बल्लीमारान स्थित उनकी हवेली को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। 16-18 दिसंबर को हुए अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी प्रो तारिक मंसूर, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ एस वाई कुरैशी जैसे गालिब को समझने वाले कई जाने माने शोधार्थी शामिल थे।