‘जिंदगी जिंदादिली का नाम है’। इसकी मिसाल समाज के लिए महिलाएं बन रही हैं। मां हो या सास, पत्नी हो या बहन, महिलाएं ही सबसे ज्यादा अंगदान कर रही हैं।
जरूरत पड़ने पर बिना अपनी जिंदगी की परवाह किए अंगदान कर अपनों की जिंदगी में जान फूंक रही है। इंडियन ट्रांसप्लांट रजिस्ट्री के मुताबिक जीते जी अंगदान करने वालों में 61 फीसदी महिलाएं हैं।
जबकि, साइबर सिटी के कई अस्पतालों में अंगदान करने वाले महिलाओं की प्रतिशत इससे ज्यादा है। जो अपने परिवार के लिए अंगदान कर कुर्बानी दे रही हैं और फिर एक अंग के सहारे अपनी जिंदगी परिवार के लिए सुपुर्द कर देती हैं।
गुड़गांव के अंग प्रत्यारोपण करने वाले अस्पतालों के आंकड़ों के मुताबिक पति की जान बचाने के लिए किडनी देने वाली 81.53 फीसदी पत्नियां होती हैं, जबकि महज 18.47 फीसदी पति ही किडनी देकर अपनी पत्नी की जान बचाते हैं।
2008 से 2012 के बीच 18.46 फीसदी डोनर पत्नी थी, जो अब बढ़कर 44.12 फीसदी पहुंच गई हैं। एनसीआर के अस्पतालों की बात करें तो यह प्रतिशत अब 52.48 पहुंच गया है।
डॉक्टरों की मानें तो जरूरत पड़ने पर पत्नी या मां ही सबसे पहले आती हैं। अंग प्रत्यारोपण अधिनियम भी सबसे पहले फर्स्ट डिग्री रिलेटिव को प्राथमिकता देता है। इसमें पत्नी, मां-बाप या बच्चे पहले आते हैं।