संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। इंडिया हैबिटेट सेंटर में मंचित नाटक ‘माधवी’ ने पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की स्थिति और उसके शोषण को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। महाभारत की कथा पर आधारित इस नाटक को प्रसिद्ध साहित्यकार भीष्म साहनी ने रचा है। प्रस्तुति में दिखाया गया कि किस तरह एक स्त्री पुरुषों की महत्वाकांक्षा और स्वार्थ के बीच केवल माध्यम बनकर रह जाती है। नाटक की मुख्य पात्र माधवी, राजा ययाति की पुत्री है। कहानी की शुरुआत ऋषि विश्वामित्र के शिष्य गालव से होती है, जो गुरु दक्षिणा के रूप में 800 श्वेत अश्वमेधी घोड़े जुटाने का संकल्प लेता है। सहायता के लिए वह राजा ययाति के पास पहुंचता है, लेकिन घोड़े देने के बजाय ययाति अपनी पुत्री माधवी को उसके साथ भेज देते हैं।
माधवी को ऐसा वरदान प्राप्त होता है कि वह पुनः कौमार्य और यौवन प्राप्त कर सकती है तथा उससे जन्म लेने वाला पुत्र चक्रवर्ती सम्राट बनता है। गालव अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए माधवी को अलग-अलग राजाओं को सौंपता है और बदले में घोड़े प्राप्त करता है। हर बार माधवी मातृत्व और बिछड़ने का दर्द सहती है, लेकिन उसकी भावनाओं को कोई महत्व नहीं देता। नाटक के अंतिम दृश्य में जब गालव भी माधवी को स्वीकार करने से हिचकिचाता है, तब माधवी पूरे पितृसत्तात्मक ढांचे को अस्वीकार करते हुए स्वयंवर छोड़ देती है। यह प्रस्तुति दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में स्त्री को अक्सर उसकी इच्छाओं और भावनाओं से अलग केवल एक साधन मान लिया जाता है।