कभी अरावली की पहाड़ियों से निकलने वाला बारिश का पानी छोटी नदियों, तालाबों और झीलों से होता हुआ यमुना तक पहुंचता था। शहरीकरण, अतिक्रमण और प्रदूषण ने इस प्राकृतिक जलतंत्र को कमजोर कर दिया। नतीजा यह है कि आज बारिश में दिल्ली जलभराव से जूझती है, जबकि यमुना तक पहुंचने वाला पानी सीवेज से दूषित होता है।
यमुना से टूटा कैचमेंट का रिश्ता
प्राकृतिक जलधाराओं के खत्म होने का असर जलभराव के साथ यमुना पर भी पड़ा है। पहले बारिश का पानी जमीन में समाता, तालाबों और वेटलैंड को भरता और फिर नदी तक पहुंचता था। अब कई जगह यह सड़कों पर बहता है या नालों के जरिये सीवेज के साथ यमुना में पहुंचता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. राधेश्याम शर्मा के मुताबिक, यमुना की सफाई के लिए मुख्य नदी के साथ उसके फ्लडप्लेन, छोटी सहायक जलधाराओं, वेटलैंड, जंगल और आसपास की खेती को भी संरक्षित करना जरूरी है।
साहिबी नदी से नजफगढ़ नाले तक की कहानी
साहिबी कभी यमुना की प्रमुख सहायक नदी थी। यह राजस्थान की अरावली पहाड़ियों से निकलकर गुरुग्राम और नजफगढ़ झील से होते हुए वजीराबाद में यमुना से मिलती थी। भारतीय संग्रहालय में मौजूद 1807 के दिल्ली के नक्शे में साहिबी नदी दिखाई देती है। बाद में आए भूकंप से इसके यमुना से जुड़ाव के टूटने का उल्लेख मिलता है। इसका पानी नजफगढ़ झील में जमा होने लगा। झील का कैचमेंट क्षेत्र तब करीब 120 वर्ग किलोमीटर था। 1912 के गजेटियर में जलस्तर बढ़ने और नमी के कारण बुखार समेत जलजनित बीमारियों का जिक्र है। 1888 में सर हेनरी डेविड की अगुवाई में झील के पानी की निकासी के लिए नजफगढ़ ड्रेन बनाई गई।
जंगल-नदी नहीं, जिंदगी नहीं
मैं मानता हूं कि हर नदी का मूल जंगल है। दिल्ली में बहने वाली यमुना की सहायक नदियां भी अरावली के घास के मैदानों और झाड़ियों से निकलती थीं। इनकी जगह विलायती कीकर ने ले ली। दिल्ली में लैंडयूज और लैंडकवर तेजी से बदला है। छोटी नदियों के बाढ़ क्षेत्र में लोग बसते रहे। इन सबका मिला-जुला असर यह हुआ कि छोटी नदियां अपने रास्ते भूलती चली गईं।