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Delhi NCR News: हाईकोर्ट ने एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा से जांच हटाने की मांग ठुकराई

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- याचिका 68 वर्षीय एक महिला ने दायर की थी
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा से एक मामले की जांच हटाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि किसी एक वीडियो या घटना के आधार पर किसी अधिकारी की पूरी छवि खराब नहीं की जा सकती। यह याचिका 68 वर्षीय एक महिला ने दायर की थी, जिसने लांबा पर निष्पक्ष जांच न करने का आरोप लगाया था।
महिला ने आरोप लगाया था कि पिछले साल रमजान के दौरान उन्हें जबरन घर से हटाया गया और पुलिस ने उन्हें एक रात अवैध रूप से हिरासत में रखा। उन्होंने मांग की थी कि उनकी शिकायत से जुड़े मामले की जांच संदीप लांबा से हटाकर किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी जाए। याचिका में कहा गया था कि जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन के दौरान संदीप लांबा का एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारते हुए वीडियो सामने आया था। इस घटना के बाद महिला को लगा कि लांबा उनकी शिकायत की निष्पक्ष जांच नहीं कर पाएंगे।
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न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने टिप्पणी की कि बड़े प्रदर्शनों के दौरान मौके की पूरी स्थिति जाने बिना किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारी को निष्पक्ष जांच और सुनवाई का अधिकार है। हाईकोर्ट ने जोर दिया कि किसी एक घटना के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि अधिकारी हर मामले में पक्षपात करेंगे। दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया कि महिला की शिकायत की जांच पूरी हो चुकी है। उनका बयान दर्ज किया जा चुका है और जांच रिपोर्ट अंतिम निर्णय के लिए सक्षम अधिकारी को भेज दी गई है। इसकी जानकारी शिकायतकर्ता को भी दी जाएगी। पुलिस के जवाब पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अब इस मामले में आगे विचार करने के लिए कुछ बाकी नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका पर सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने इस मामले में पुलिस जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया।
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अधिकारी को निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार
अदालत ने कहा कि यदि किसी अधिकारी से किसी स्थिति को संभालने में गलती हुई है, तो उसकी जांच हो सकती है। लेकिन केवल इसके आधार पर अधिकारी को हर मामले में पक्षपाती नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारी को भी निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार है। प्रदर्शन करना लोगों का अधिकार है, पर इसका मतलब यह नहीं कि कानून-व्यवस्था को प्रभावित किया जाए।
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