दिल्ली विधानसभा का चुनाव अक्तूबर 1951 में हुआ। परिणाम आने पर कांग्रेस विधायकों ने तत्कालीन वरिष्ठ नेता लाला देशबंधु गुप्ता को अपना नेता चुना, लेकिन मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले एक हादसे में उनका निधन हो गया। इसके बाद चौधरी ब्रह्म प्रकाश को मुख्यमंत्री बनाया गया। अपने समकालीनों में कनिष्ठ होने के बावजूद वह फरवरी 1955 तक मुख्यमंत्री रहे।
उस समय जनसंघ से जुड़े धर्मवीर शर्मा ने बताया कि चौधरी ब्रह्म प्रकाश तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पसंद थे। वह अपनी जुबान के पक्के थे। आम लोगों के साथ वह बसों में सफर किया करते थे और रास्ते पर चलते-चलते ही लोगों शिकायतों का निपटारा करवा देते थे। दिलचस्प यह कि बाद में वह चार बार दिल्ली से सांसद रहे, लेकिन उन्होंने अपने रहन-सहन में कोई बदलाव नहीं किया। चौधरी ब्रह्म प्रकाश की शार्गिदी में दिल्ली के कांग्रेस नेताओं की पूरी पौध तैयार हुई। कांग्रेस के एचके एल भगत, जगदीश टाइटलर, ब्रज मोहन, सज्जन कुमार और रामबाबू शर्मा जैसे कई नेताओं को उनका पिता तुल्य अभिभावकत्व मिला।
दिल्ली का नैरोबी की तर्ज पर करना चाहते थे विकास
अपने कार्यकाल में चौधरी ब्रह्म प्रकाश ने दिल्ली के विकास की नींव रखी। सहकारिता कमेटियों का गठन किया। केन्या से लगाव की वजह से वह दिल्ली शहर का विकास नैरोबी शहर की तर्ज पर करना चाहते थे। असल में उनका जन्म केन्या में हुआ था। 16 साल की उम्र में वह माता-पिता संग दिल्ली आए थे। उनके जीवन में केन्या के परिवेश का काफी प्रभाव रहा।
कांग्रेस से तोड़ लिया था नाता
चौधरी ब्रह्म प्रकाश 1980 के दशक में लोकदल से जुड़े। केंद्र की तत्कालीन चौधरी चरण सिंह की सरकार में वह केंद्रीय खाद्य, कृषि, सिंचाई और सहकारिता मंत्री भी रहे। 1993 में उनका निधन हो गया।