जांच में सामने आया कि आरोपी ने 11 शेल कंपनियों के नाम पर अलग-अलग बैंकों से कुल 18 करोड़ रुपये का लोन और ओवरड्राफ्ट लिया। उषा रानी ने पुलिस को बताया कि वह दोनों किरायेदारों को लगभग भूल चुकी थीं। अप्रैल 2013 में जब दो लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के वकील बताकर उनके दरवाजे पर दस्तक दी, तब उन्हें ठगी का पता चला।
पुलिस जांच में पता चला कि आरोपी ने उषा रानी के नाम का पैन कार्ड तो बनवाया लेकिन उस पर फोटो किसी और की थी। हस्ताक्षर भी मेल नहीं खाते थे। जब पुलिस सब-रजिस्ट्रार ऑफिस पहुंची तो बताया गया कि फरवरी में एक महिला खुद को उषा बताकर सेल डीड ट्रांसफर कराने आई थी। वह महिला ओडिशा की थी और उसका उषा से कोई संबंध नहीं था।
पुलिस जांच में पता चला कि सचिन फ्लैट पर कब्जा नहीं करना चाहता था। उषा की प्रॉपर्टी की डिटेल लेकर लोन लिया जा सके, इसलिए वह केवल रेंट एग्रीमेंट चाहता था। आरोपी सचिन ने पूर्व में भी कई मामलों में दूसरे नामों का इस्तेमाल किया है। 2011 में सीबीआई ने उसे धोखाधड़ी के मामले में आरोपी बनाया था। वह 10 अन्य मामलों में भी शामिल था, जिसमें उसके भाई और जीजा संजीव के नाम पर भी लोन लिए गए।