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सूरजकुंड मेला:  150 साल पुरानी कला इस्राइल को आई पसंद

Wed, 01 Feb 2017 10:52 PM IST
सिद्धार्थ शाह/अमर उजाला, फरीदाबाद
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- फोटो : अमर उजाला
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फैशन डिजाइनर बनने के बाद रेजा हथकरघा कला को बचाना था। 150 वर्ष से यह कला विलुप्त हो गई थी। इसके लिए 300 साल पुराने कपड़ों के साथ शोध किया। अब यह सबसे पहले इस्राइल एवं जर्मनी को पसंद आई।
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हरियाणा के रोहतक के बोहर गांव की रहने वाली ललिता चौधरी ने 31 वें अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेले में विलुप्त कला रेजा हथकरघा के स्टॉल के माध्यम से देशी-विदेशी पर्यटकों को जागरूक कर रही हैं। ललिता ने तीन वर्षों तक इस पर रिसर्च किया। उन्होंने इसके बाजार से लुप्त होने के कारणों का पता लगाया।

रेजा हथकरघा से बना कपड़ा मोटा होने के कारण प्रयोग में नहीं आ रहा था। दूसरी तरफ इस में लगने वाले श्रमिकों को मात्र 200 रुपये मिलते थे, जबकि बाकी जगह 500 रुपये मिलते थे। उन्होंने इन दोनों कमियों को दूर किया। वह करीब 200 लोगों को रेजा हथकरघा हस्तशिल्प से जोड़कर पहचान दिलाने में जुट गई हैं।
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वर्ष 2016 से वह अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प बाजार में विशिष्ट पहचान बना रही हैं। इन कपड़ों की खासियत यह है कि यह मौसम के अनुकूल बदलते रहेंगे। यह गर्मियों के दिनों में ठंडे एवं सर्दियों के दिनों में गर्म रहेंगे। इन कपड़ों से त्वचा की बीमारियों से निजात मिलेगी। 

सिंधु घाटी सभ्यता में थे इसके निशान
ललिता चौधरी ने दावा किया है कि सिंधु घाटी सभ्यता में इन वस्त्रों के निशान मिले थे। यह कला पिछले 15 दशकों से प्रयोग में नहीं थी। इसको रिसाइकिल कर प्रयोग किया गया। इसके लिए उन्होंने पिछले तीन सालों में 20 लाख रुपये खर्च किए हैं। उन्होंने गुजरात से पतला धागा कटवाया। अब यह मोटे एवं पतले दोनों तरह के वस्त्र को पाश्चात्य एवं भारतीय वस्त्रों के रूप में तैयार कर रही हैं, ताकि विदेश में अपनी छाप छोड़ सकें। सबसे पहले उन्होंने जूते बनाने का कार्य किया है।

सेलिब्रिटी से पहचान दिलाने का जुनून
ललिता चौधरी इसके लिए संग्राम सिंह, पायल रोहतगी, वैष्णवी के फोटो शूट कराने के लिए रेजा हथकरघा से बने कपड़ों को इस्तेमाल कराती हैं ताकि युवा वर्ग इस कला को जान सकें।
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