देश की सर्वोच्च अदालत के सोशल मीडिया पर मंगलवार को दिए निर्णय का साइबर सिटी के युवाओं ने स्वागत किया है।
उनका कहना है कि साइबर कानून की धारा वास्वत में संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन कर रही थी। इसे समाप्त कर सुप्रीम कोर्ट ने काफी अच्छा काम किया है।
यह काफी सराहनीय है। साथ ही युवाओं का यह भी कहना है कि गलत पोस्ट और टिप्पणी से सभी को परहेज करना भी जरूरी है।
पिछले कुछ समय से गलत पोस्ट और टिप्पणी को लेकर देश भर में कई लोगों को जेल की हवा खानी पड़ी है। सोशल मीडिया आज देश के युवाओं की धड़कन बन गई है।
वह दिन भर में कई घंटे तक इस पर अपना समय व्यतीत करते हैं। गुड़गांव के युवाओं का कहना है कि बड़े और प्रभावशाली लोग साइबर कानून की धारा 66ए का फायदा उठा रहे थे।
जिसके कारण अपराध अधिक नहीं होने पर भी लोगों को जेल की हवा खानी पड़ रही थी। फिलहाल अब मनमाने तरीके से किसी को पुलिस जेल नहीं भेज सकती है।
बीपीओ कर्मी अरुण का कहना है कि किसी मामले में अपनी असहमति व्यक्ति करने का अधिकार हर नागरिक का है। यही बात सोशल मीडिया पर भी लागू होती है।
मगर इस असहमति की भाषा ऐसी होनी चाहिए कि किसी भी धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक भावना को ठेस नहीं पहुंचे। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय मील का पत्थर साबित होगा।
इससे सोशल मीडिया के प्रयोग से लोग आतंकित नहीं होंगे। क्योंकि आज के तकनीकी दौर में यह युवाओं के लिए किसी ऑक्सीजन से कम नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है। साइबर कानून की धारा 66ए रद्द होना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए जरूरी थी।
सुशील शुक्ल (बीपीओ प्रोफेशनल)
सोशल मीडिया पर सीमा से बाहर जाकर न तो कोई पोस्ट डालनी चाहिए और न ही कोई टिप्पणी करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय स्वागतयोग्य है।
प्रतिभा (छात्रा)
सोशल मीडिया आज युवाओं के लिए ऑक्सीजन है। साइबर कानून की धारा 66ए इस मामले में कुछ ज्यादा ही कठोर था। इसके खत्म होने से सोशल साइट्स यूजर से काफी सारा दबाव घट गया।
दीपक (छात्र)
तकनीक के इस दौर में सोशल साइट्स के प्रयोग से लोगों की जानकारी बढ़ती है। साथ ही साथ लोग जागरूक भी होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से राहत मिली है। मगर किसी को सोशल साइट्स पर गलत हरकत नहीं करना चाहिए।
प्रिया (छात्रा)