पिता की मर्सिडीज कार से एक नौजवान को कुचलने वाले एक किशोर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। वर्ष 2016 में हुई इस सड़क घटना केवक्त किशोर बालिग होने की उम्र(18 वर्ष) से महज चार दिन कम था। किशोर पर गैर इरादन हत्या का आरोप है।
जस्टिस दीपक गुप्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को कहा कि किशोर का अपराध जुवेनाइल जस्टिस एक्ट केतहत नृशंस अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। पीठ ने कहा कि चूंकि इस अपराध में न्यूनतम सात वर्ष की सजा नहीं है, लिहाजा यह नृशंस अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि हम कानून में कुछ जोड़ या घटाव नहीं कर सकते। जब दो व्याख्याएं संभव हो तो उसे चुनना चाहिए जो जुवेनाइल के लिए फायदेमंद हो। पीठ ने कहा कि जब कानूनी प्रावधान स्पष्ट हो तो उसकी अलग से व्याख्या जरूरी नहीं है।
वास्तव में सुप्रीम कोर्ट केसमक्ष उस कानूनी प्रावधान की व्याख्या करना था कि जिन अपराधों में न्यूनतम सजा कुछ तय न हो। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह सवाल था कि ऐसे अपराधों को कैसे डील किया जाना चाहिए।
मौजूदा मामले में जुवेनाइल पर आईपीसी की धारा-304 (गैर इरादन हत्या) का मुकदमा दर्ज किया गया था। इस अपराध के तहत न्यूनतम सजा कुछ भी तय नहीं है लेकिन अधिकतम सजा उम्रकैद तक है। वहीं जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत जुवेनाइल पर तब ही बालिग की तरह ट्रायल चल सकता है जब नृशंस अपराध हो जिसमें न्यूनतम सात वर्ष कैद की सजा का प्रावधान हो।
जुवेनाइल बोर्ड ने यह कहते हुए किशोर पर बालिग केतरह मुकदमा चलाने का निर्णय लिया था कि किशोर को अपने कृत्य से होने वाले खतरों के बारे में भलीभांति जानकारी थी। हालांकि हाईकोर्ट ने जुवेनाइल बोर्ड केविपरीत फैसला दिया था। हाईकोर्ट के इस आदेश को हादसे में मारे गए मार्केटिंग एग्जक्यूटिव सिद्धार्थ शर्मा की पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।