दिल्ली सरकार की ओर से 2005 में किए गए अधिग्रहण के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार व दिल्ली विकास प्राधिकरण से जवाब तलब किया है।
राजधानी के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के गांव प्रहलादपुर बांगर और मोहम्मदपुर मजरी में नौ साल पहले यह अधिग्रहण किया गया था, जिसे सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई है।
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जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पीठ ने किसानों की ओर से दायर याचिका पर केंद्र और डीडीए से तीन स्पताह में जवाब दाखिल करने को कहा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता सूरत सिंह ने पीठ के समक्ष तर्क दिया कि दिल्ली सरकार की ओर से किया गया यह अधिग्रहण कानून के सिद्धांतों के विपरीत है।
जबकि अधिग्रहण के संबंध में नया कानून आ चुका है, गतवर्ष लाया गया भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता और उचित मुआवजे का अधिकार, पुनर्वास एवं पुर्नस्थापन अधिनियम में यह स्पष्ट है।
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यदि मुआवजा पांच साल पहले दिया गया है तो नए अधिनियम के तहत निपटारा किया जाएगा। इसके अलावा यदि जमीन पर किसानों का कब्जा बरकरार है तो उस भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को खत्म माना जाएगा।
पीठ से अधिवक्ता ने कहा कि अधिग्रहण के एवज में किसानों को महज 326 रुपये प्रति स्क्वायर यार्ड के मुताबिक मुआवजा दिया गया है। जबकि उसी भूमि को विकास के नाम पर कुछ समय बाद 3600 रुपये प्रति स्क्वायर यार्ड की कीमत से बिल्डिंग और शापिंग माल बनाने के लिए बेचा गया।
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यह अंतर स्पष्ट तौर पर सौ गुना है, जो अनुचित है और कानून के प्रावधानों का उल्लंघन होने के साथ संविधान में नागरिकों को मिले अधिकारों के भी खिलाफ है।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर दायर याचिकाओं को नौ साल की देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। लेकिन अधिग्रहण पर नया कानून आने पर यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया गया, जिस पर अदालत ने केंद्र और डीडीए को नोटिस जारी कर दिया।