केंद्र सरकार ने साफ कर दिया कि सीएफएल निर्माता कंपनियों को हर हाल में ई-कचरा प्रबंधन नियमों का पालन करना होगा, इसके लिए उन्हें ऐसे प्रबंध करने होंगे कि उपभोक्ताओं से अवधि खत्म बल्ब स्वयं एकत्रित करे।
केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष उक्त तर्क रखते हुए कहा कि सीएफएल बल्ब ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कंपनियां बनाती है लेकिन उक्त कंपनियां यूरोप व अन्य देशों में तो ई-कचरा प्रबंधन नियमों का पालन करती है लेकिन भारत में नहीं करना चाहती।
मुख्य न्यायाधीश जी.रोहिणी व न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की खंडपीठ के समक्ष केंद्र सरकार के अधिवक्ता ने यह नए नियम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और इन मर्करी लाइट के अनुरूप है।
इन बल्बों को इस प्रकार खुले में फेंकने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ता है। पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल संजय जैन ने खंडपीठ को बताया कि इन प्रकार के बल्ब के अधिकांश निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं, यह कंपनियां यूरोप और अन्य देशों में इस तरह के सभी नियमों का पालन कर रहे हैं।
उन्होंने भारत में लचीली व्यवस्था को देखते हुए भारत में यह कंपनियां नियमों का पालन नहीं करना चाहती। उन्होंने कहा कि कंपनियों को पर्यावरण को सुरक्षित बनाने की दिशा में भारत में नियमों का पालन करना होगा।
कंपनियों की और से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पी.चिदंबरम ने तर्क रखा कि नए नियमों का पालन करना असंभव है। नए व्नियमों में कंपनियों को ही जिम्मेदारी दी गई है कि वह अवधि खत्म फ्लोरोसेंट लैंप और अन्य पारा युक्त बल्ब उपभोक्ताओं से इकट्ठा करें और उसका निपटारा करे।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इस असंभव काम करने के लिए हमें मजबूर नहीं कर सकती। इसके अलावा सरकार निमय मामले में अन्य देशों के साथ भारत की तुलना नहीं कर सकती। यह सरासर मनमाना रवैया है इस प्रकार से कंपनियां व्यापार नहीं कर सकती।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा हम सभी का मुद्दा पर्यावरण को नुकसान न हो इससे जुड़ा है और वे इस याचिका पर 28 सितंबर को अपना निर्णय देंगे।
खंडपीठ ने नए नियमों को चुनौती देने वाली सीएफएल निर्माता कंपनी फिलिप्स लाईटिंग, हैवेल्स, सूर्य और इलेक्ट्रिक लैंप और उपकरण मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई कर रही है।