पता ही नहीं चलता कि कब फरीदाबाद की मल्टी स्टोरी सोसाइटी खत्म होती हैं और सहसा खेतों के बीच चौराहा आ जाता है जिस पर जाट चौक लिखा है। यहीं से बायें मुड़ने पर जाट बहुल साहूपुरा गांव आता है।
गांव के बीच से सीमेंट की टाइलों से बनी रोड निकलती है जिसके दोनों और खेत हैं और दो-तीन किलोमीटर चलने पर सुनपेड़ गांव दिखने लगता है। पक्के बड़े बड़े घरों में लग्जरी गाड़ियां भी दिख जाती हैं।
सड़क पर पुलिस के लाव-लश्कर को देखकर जरूर एहसास होता है कि यहां कोई बड़ी घटना हुई है। गांव के अंदर दाईं तरफ गली में मुड़ने पर थोड़ी दूर ही अग्निकांड में अपने दो मासूम बच्चों को गंवाने वाले जितेंद्र का दो मंजिला घर है।
जली खिड़की और सीलबंद दरवाजे बताते हैं घटना की भयावहता
इसके आसपास के ज्यादातर मकान दलितों के हैं। ठाकुरों और दलित बस्ती के मकानों में कोई अंतर नहीं है। चार हजार की आबादी वाले इस निर्मल गांव में जातीय हिंसा के बीज शायद दलितों के अपने पैरों पर खड़े होने के सच से जुड़े हैं।
गांव ठाकुर बहुल है, उनके पास जमीन है तो ज्यादातर दलित फरीदाबाद की फैक्टरियों में काम करते हैं। खेतों में दलितों के काम करना धीरे धीरे कम होता चला गया।
19 अक्तूबर की रात में अपने दो मासूम बच्चों को खोने वाले जितेंद्र के पिता आरएमपी डाक्टर थे। परिवार में ज्यादातर लोग उच्च शिक्षित हैं। जली खिड़की और सीलबंद दरवाजे घटना की भयावहता बयान करते दिखते हैं।
महिलाओं की आंखों के आंसू आज भी सूखे नहीं हैं।
परिवार से जुड़े नौजवान सुरेंद्र आने जाने वालों से बातचीत कर रहे हैं, बताते हैं वे अमेरिका में मर्चेंट नेवी में अधिकारी हैं। परिवार की महिलाओं की आंखों के आंसू आज भी सूखे नहीं हैं।
मकान के कोने पर ही वह परचून की दुकान है जो घटना के बाद पिछले एक साल से बंद है। यहीं मोबाइल नाले में गिरने पर भड़के संघर्ष में ठाकुर समुदाय के तीन लोगों की जान गई थी।
बस यही वह घटना थी जिसने गांव में बरसों से पल रही असहज चुप्पी को तोड़ दिया। इसी दुकान से थोड़ा आगे वह मैदान है जहां जागरण हो रहा था जिसमें बच्चों की चीखें दब गईं।
वहीं भी पुलिस और आरएएफ के जवाब बैठे सुस्ता रहे हैं। जितेंद्र के रिश्तेदार कहते हैं, हमारा आगे बढ़ना ठाकुरों को खटक रहा था। देखो किस तरह मकान को घेरकर एक परिवार को जिंदा जलाने का प्रयास किया।
क्या हम मासूम बच्चों की जान लेते
आरोपियों के परिवार को टीस है उनका नाम तो इस कांड में लिया जा रहा है लेकिन उन लोगों पर जो बीती है उसका अहसास किसी को नहीं। मुख्य आरोपी बलवंत के घर बैठे बुजुर्ग कहते हैं, हमारे तीन लोगों की जान गई।
अगर बदला लेना होता तो तभी लेते। क्या हम मासूम बच्चों की जान लेंगे। आरोपी वकील एदल सिंह की पत्नी राजबाला कहती हैं, मेरे पति को वारदात वाली रात बल्लभगढ़ में थे। उनका नाम फंसाने के लिए रिपोर्ट में लिखाया।
एक महिला कहती हैं, सब जानते हैं जितेंद्र और उसकी पत्नी की नहीं बनती थी। नफरत कितनी गहरी है-इसे अजीब ही कहेंगे कि गांव में दोनों परिवारों या दोनों समुदायों से कोई भी शख्स ऐसा नहीं जो नफरत की दीवार को गिराने की कोशिश करे। हद तो यह कि एक समुदाय ने दूसरे के गम में शरीक होना तक जरूरी नहीं समझा। अगर कोई आया भी तो उसकी नीयत पर शक किया गया।