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इस स्कूल में टॉयलेट के लिए लगती है लाइन

Fri, 29 Aug 2014 06:24 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
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फरीदाबाद में शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत सरकार बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का तो दावा कर रही है लेकिन असली सवाल यह है कि उन्हें मूलभूत सुविधाएं कौन दिलाएगा।
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सरकारी स्कूलों में पीने के पानी से लेकर शौचालय तक की स्थिति बदतर है। जिसके लिए विभाग के पास कोई ठोस योजना नहीं है। इस मामले पर जब अमर उजाला की टीम ने अजरौंदा स्थित राजकीय प्राथमिक पाठशाला का दौरा किया तो स्थिति बड़ी भयावह दिखी।

इस स्कूल में शौचालय जाने के लिए बच्चों को लाइन लगानी पड़ती है। बच्चों की संख्या के मुताबिक टॉयलेट नहीं हैं। पेश है संवाददाता कुंदन तिवारी और ग्रोटोग्राफर गौरव चौधरी की रिपोर्ट।
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दो-दो बच्चे ही भीड़ बना देते
अजरौंदा स्कूल में कहने को तो चार टॉयलेट बने हुए हैं। जिसमें से दो लड़कियों के लिए और दो लड़कों के हैं। लेकिन इन पर भी बच्चों को शुलभ शौचालय की तरह नंबर लगाना पड़ता है। अगर प्रत्येक कक्षा से दो-दो विद्यार्थियों को टॉयलेट के लिए छुट्टी दे दी जाती है तो गेट पर ही भीड़ जमा हो जाती है। ऐसे में बच्चों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ता है।

लंच के समय स्थिति हो जाती है दयनीय
हमने स्कूल टॉयलेट की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए लंच तक का इंतजार किया। उस समय की स्थिति को देखकर दंग रह गए। लंच की घोषणा होते ही करीब चौथाई स्कूल टॉयलेट गेट पर जमा हो गया। लेकिन यहां खड़े बच्चों को करीब आधा घंटे टॉयलेट के अंदर जाने के लिए इंतजार करना पड़ा। ऐसे में कई बच्चों ने इस समस्या पर बहुत अधिक नाराजगी प्रकट की।

गंदगी कैसे हो दूर
स्कूल में एक पार्ट टाइम स्वीपर रखा गया है। जिसे विभाग की ओर से 1000 रुपये मासिक भुगतान किया जाता है। यह स्वीपर स्कूल में सिर्फ दो घंटे ही काम करता है। वह छह बजे स्कूल पहुंच जाता है और 8:00 बजे चला जाता है। यानि आठ बजे तक स्कूल शुरू होता है। उस समय स्वीपर की छुट्टी हो जाती है। ऐसे में दिन भर बच्चों को गंदे टॉयलेट में ही आना-जाना पड़ता है।

पीने के पानी की रहती है दिक्कत
इतनी भीषण गर्मी में भी यहां आमतौर पर पीने के पानी का संकट बना रहता है। नगर निगम अधिकारियों की हीलाहवाली से कई कई दिन पानी की मोटर तक नहीं चलाई जाती है। जिससे बच्चों को परेशानी उठानी पड़ती है। इस स्कूल में 491 बच्चे हैं। इनका प्रतिदिन मिड डे मील भी आता है। पानी की कमी से बर्तन धोने का संकट बना रहता है।

नियमानुसार कमरों की भी है कमी
शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत एक कमरे में 30 बच्चों को ही बैठाया जा सकता है। लेकिन स्कूल में महज छह कमरे ही बने हुए हैं। जिसमें 491 बच्चे ठूस दिए जाते हैं।
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बच्चों की कुल संख्या: 491
लड़के: 269
लड़कियां: 222
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