'अगर लाइटें नहीं बुझी होतीं तो और बच्चों को बचा सकते थे'
जेम्स ने कहा, 'अगर लाइटें नहीं बुझी होतीं तो वे और अधिक बच्चों को बचा सकते थे। यह सब बहुत अचानक हुआ। हममें से किसी ने भी इसकी उम्मीद नहीं की थी।' सहायक नर्सिंग अधीक्षक नलिनी सूद ने जेम्स की वीरता की प्रशंसा की और बचाव अभियान कैसे चलाया गया, इसकी कुछ बातें बताईं। उन्होंने कहा, "अस्पताल के कर्मचारियों ने बच्चों को निकालने के लिए एनआईसीयू वार्ड के शीशे तोड़ दिए, तभी नर्स मेघा की सलवार में आग लग गई। अपनी सुरक्षा की परवाह करने के बजाय, वह बच्चों को बचाने के लिए वहां रुकी और उन्हें बाहर लोगों को सौंप दिया।"
'उस दृश्य को याद करती हूं तो मुझे रोना आता है'
नलिनी सूद ने कहा, 'जेम्स का फिलहाल उसी मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा है। उसने कहा कि उसे नहीं पता कि वह कितनी जली है। बचाए गए बच्चों को एनआईसीयू वार्ड के बहुत करीब एक वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया... जब मैं उस दृश्य को याद करती हूं तो मुझे रोना आता है।" मेडिकल कॉलेज में एनेस्थिसियोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अंशुल जैन ने मानक बचाव अभियान के बारे में बताया और दावा किया कि अस्पताल ने टी प्रोटोकॉल का पालन किया।
पहले कम प्रभावित रोगियों को निकालने की है नीति
डॉ. अंशुल जैन ने कहा, "आईसीयू निकासी के दौरान ट्राइएज प्रक्रिया में नीति पहले कम प्रभावित रोगियों को निकालने की है। इस दृष्टिकोण के पीछे तर्क यह है कि न्यूनतम समर्थन की आवश्यकता वाले रोगियों को जल्दी से स्थानांतरित किया जा सकता है, जिससे बड़ी संख्या में निकासी को कम समय में पूरा किया जा सके। इसके विपरीत, वेंटिलेटर पर या उच्च ऑक्सीजन समर्थन की आवश्यकता वाले मरीज़ निकासी के लिए अधिक समय और संसाधनों की मांग करते हैं।"