पंजाब और हरियाणा में पिछले साल की तुलना में इस साल पराली (फसलों के अवशेष) जलाने की घटनाओं में ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। अधिकारियों का कहना है कि इसका प्रमुख कारण धान की फसल की समय पूर्व कटाई और खेत मजदूरों की अनुपलब्धता है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) के मुताबिक, अब तक पराली जलाने की 4585 घटनाएं हो दर्ज की जा चुकी हैं, जबकि पिछले साल इस अवधि तक 1631 घटनाएं हुई थीं। इसी तरह हरियाणा में पिछले साल 16 अक्तूबर तक 1200 घटनाएं हुई थी, जबकि इस साल 2016 घटनाएं हो चुकी हैं।
पीपीसीबी के सदस्य सचिव करुणेश गर्ग ने कहा, इस साल धान की फसल की अधिक कटाई के चलते पराली जलाने की घटनाएं बढ़ी हैं। पिछले साल 15 अक्तूबर तक करीब 17 लाख
मीट्रिक टन धान की कटाई हुई थी। इस साल अब तक करीब 40 लाख मीट्रिक टन कटाई हो चुकी है। इससे पता चलता है कि किसानों ने इस साल समय से पहले फसल की कटाई कर ली है। पिछले साल मानसून सितंबर अंत तक रहा था, जिससे कटाई में देरी हुई थी।
वहीं, हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव एस नारायण ने कहा, हरियाणा में पराली जलाने की ज्यादातर घटनाएं सिरसा, फतेहाबाद और कैथल में हुई हैं। प्रशासन इन इलाकों में पराली जलाने पर पूरी तरह रोक नहीं लगा पाया है। नारायण के मुताबिक, खेती मजदूरों की अनुपलब्धता इसका एक कारण है।
दिल्ली में प्रदूषण के पंजाब को दोष देना गलत
गर्ग ने कहा कि दिल्ली में हवा की खराब गुणवत्ता के लिए पंजाब को दोष देना सही नहीं है। दिल्ली के प्रदूषण के लिए पराली जलाना एक कारण हो सकता है, लेकिन इसकी हिस्सेदारी
एक फीसदी से भी कम है। दरअसल, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने दिल्ली की वायु गुणवत्ता बेहद खराब श्रेणी में पहुंचने के बाद पंजाब को पराली जलाने पर नियंत्रण लगाने को कहा था।