सटोरियों की पहुंच गांवों तक हो गई है। गांवों में रहने वाले नव धनाढ्य परिवारों के बच्चों को सट्टे के जाल में फंसाया जा रहा है। लालच और अशिक्षा के चलते युवा ही नहीं बुजुर्ग भी इसमें हाथ आजमा रहे हैं।
एक रुपये के दांव पर तीस रुपये मिलने की लालच गांवों तक पहुंच चुकी है। सटोरियों के एजेंट वहां युवाओं को थोड़ा लगाकर बहुत कमाने की लालच दे रहे हैं। एक एजेंट ने बताया कि देश-विदेश के शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव, फुटबॉल, क्रिकेट, कबड्डी मैच यहां तक कि दिल्ली एयरपोर्ट पर आने जाने वाली फ्लाइट के टाइम पर भी सट्टा लगाया जाता है।
दांव लगाने वाले को पच्चीस से तीस विकल्प दिए जाते हैं। इन पर एक से लेकर कई लाख रुपये तक लगाए जा सकते हैं। जीतने पर दो घंटे के अंदर भुगतान भी कर दिया जाता है। बल्लभगढ़ निवासी एक सट्टा खिलाड़ी ने कहा कि वह गांव में ही दांव लगाना ज्यादा पसंद करता है, क्योंकि पैसा लगे हाथ मिल जाता है और कहीं जाना नहीं पड़ता। एक साल पहले दस कीला जमीन बेचकर करोड़पति हुए एक बुजुर्ग कहते हैं कि गांव का छोरा ही सट्टा चलाता है तो गांव का पैसा गांव में ही तो जा रहा है।
आरटीआई कार्यकर्ता केएल गेरा बताते हैं कि सट्टा कारोबार की जड़ें गांवों तक गहरे जम चुकी हैं। इसमें फंसकर कई युवा सबकुछ गंवाने के बाद अब खुद एजेंट बन दूसरों को बर्बाद कर रहे हैं। पुलिस आयुक्त सुभाष यादव ने कहा कि जिले में सट्टा कारोबार को पूरी तरह खत्म किया जाएगा। इसके लिए तेजी से प्रयास किए जा रहे हैं।