मंदिर में अर्पण करने के बाद फूलों को नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इससे जल प्रदूषण होता है तो वहीं यह पानी पीने योग्य भी नहीं रहता। इसलिए मंदिरों से इन फूलों को एकत्र कर अगरबत्ती बनाने का कार्य एक गैर लाभ वाले संगठन कनैक्टिंग ड्रीम फाउंडेशन ने सामाजिक उद्यमिता कार्यक्रम अर्पण के अंतर्गत शुरू किया है।
इस कार्य में दिव्यांगों व ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देकर उनके सशक्तीकरण का कार्य किया जा रहा है। यह संस्था अर्पण के अलावा श्रीराम कॉलेज कॉमर्स (एसआरसीसी) के साथ मिलकर शिक्षा, महिलाओं में स्वच्छता, वायु प्रदूषण के साथ ही लुप्त हो रही कलाओं को दोबारा जीवित करने के कार्यक्रम चला रही है।
संगठन का कहना है कि आम अगरबत्तियों में चारकोल का प्रयोग होता है जो जलने पर वायु प्रदूषण करता है और शरीर को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए अर्पण के अंतर्गत बनने वाली अगरबत्ती में चारकोल का इस्तेमाल नहीं किया जाता जिससे वायु प्रदूषण नहीं बल्कि भीनी खुशबू होती है। इसके साथ इनकी पैकिंग के लिए प्लास्टिक का प्रयोग नहीं किया जाता।
अर्पण के एसेंट का मकसद फूलों की खुशबू युक्त उच्च गुणवत्ता वाली अगरबत्ती निर्माण से इस क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन करना है। यह अगरबत्ती लेवेंडर, गुलाब, लिली, लेमन ग्रास, लोबान तथा जैसमीन की खुशबू में बनाई जाती हैं। काफी अध्ययन के बाद यह पता चला कि चारकोल के स्थान पर अगरबत्ती बनाने में फूलों का प्रयोग किया जा सकता है जिससे वायू प्रदूषण नहीं होगा। बाजार में काफी पड़ताल करने के बाद फार्मूला बनाकर उस पर पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट में अनुसंधान के बाद फूलों से अगरबत्ती बनाने का काम शुरू किया गया है।