टूटा पैर फिर भी नहीं टूटा दिव्या का हौसला
बिना कोच के तीरंदाजी में रचा स्वर्णिम इतिहास
काजल कुमारी
नई दिल्ली। सर्वोदय कन्या विद्यालय की 11वीं कक्षा की छात्रा दिव्या की कहानी जुनून, संघर्ष और हौसले की मिसाल है। तीरंदाजी जैसे महंगे खेल में कदम रखने के लिए जब आर्थिक मुश्किलें आईं, तो मां सोनिया ने बेटी के सपने को बचाने के लिए अपने झुमके और अंगूठी तक बेच दी। आज उसी त्याग की चमक दिव्या के गोल्ड मेडल में दिखती है।
दिव्या का तीरंदाजी सफर फरवरी 2021 में शुरू हुआ। महंगे उपकरणों के लिए मां ने गहने बेचकर उसके हाथों में धनुष थमाया। दिव्या स्कूल के बाद बस से जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम अभ्यास करने जाती और मां हर दिन उनके साथ रहती। 28 मार्च 2021 को दिल्ली स्टेट टूर्नामेंट में रजत जीतने के बाद उनका प्रदर्शन निखरा। अब तक वे 13 स्वर्ण, छह रजत और तीन कांस्य पदक जीत चुकी हैं।
हौसले की सबसे बड़ी परीक्षा डीडीए टूर्नामेंट से पांच दिन पहले आई, जब सीढ़ियों से गिरने पर उनका पैर फ्रैक्चर हो गया। डॉक्टरों ने आराम की सलाह दी, लेकिन दिव्या ने दो दिन बाद प्लास्टर हटवाकर मैदान पर उतरी और स्वर्ण पदक जीता।
एक साल पढ़ाई व आर्थिक तंगी की वजह से दिव्या को तीरंदाजी छोड़नी पड़ी, लेकिन स्कूल की शिक्षिका रूपा व प्रिंसिपल अनिल भाटी ने प्रेरित किया। 11 जुलाई को बिना कोच व महज छह दिन की तैयारी के साथ दोबारा धनुष उठाया और सीबीएसई प्रतियोगिता में स्वर्ण जीता। इसके बाद दिल्ली स्कूल स्टेट गेम्स में भी दो स्वर्ण अपने नाम किए। दिव्या का सपना अब ओलंपिक में देश के लिए तिरंगा लहराना है।