रविवार को संपन्न हुए छोटी सरकार के चुनाव में अधिकांश भाजपा समर्थक सरपंच के दावेदार धराशायी हो गए। माना जा रहा है कि उन्हें पार्टी के क्षेत्रीय नेताओं की गांव के विकास को लेकर बरती जा रही उपेक्षा उनकी नैया ले डूबी।
ऐसे में अब नगर निगम पार्षद के चुनाव की राह भी भाजपा के लिए आसान नहीं है। हालांकि पंच-सरपंच का चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं होता लेकिन चुनाव मैदान में उतरे अधिकांश प्रत्याशी भाजपा समर्थक ही बताए जा रहे हैं।
यही कारण है कि पार्टी का कोई पदाधिकारी पंचायत चुनाव के मामले में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। खुद केंद्रीय राज्यमंत्री के मामा का चुनाव हार जाना इसका जीता-जागता उदाहरण है।
पार्टी सूत्रों की मानें तो पंचायत चुनाव में हर गांव से सरपंच पद के उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। हरियाणा पंचायती राज एक्ट 1994 के तहत पंच-सरपंच पद के लिए चुनाव पार्टी सिंबल से लडने की कोई व्यवस्था नहीं है।
लेकिन खड़े हुए उम्मीदवारों की आस्था भाजपा से रही है। हर गांव में पार्टी समर्थित उम्मीदवारों को बड़े नेताओं का आर्शीवाद भी प्राप्त था लेकिन चुनाव में वह गुल नहीं खिला पाए।
खुद इस बात को पार्टी के नेता मानते हैं। नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि गांवों में लोग अब पार्टी के क्षेत्रीय नेताओं के रवैये से नाराज हैं। या फिर पार्टी पदाधिकारी ग्रामीणों में अपनी पैठ नहीं बना पाए हैं।
उन्होंने माना कि यही हाल रहा तो निगम पार्षद चुनाव की राह भी पार्टी के लिए आसान नहीं होगी। उन्होंने तो यहां तक बताया कि पार्टी के बड़े नेताओं का दबाव भी समर्थकों की मदद करने के लिए आया था। समर्थकों की मदद की भी गई लेकिन परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं आए।