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दिल्ली: शीला दीक्षित ने कभी अहंकार को नहीं होने दिया हावी

Sun, 21 Jul 2019 06:40 AM IST
Abhishek Singh न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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शीला दीक्षित - फोटो : Social Media
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शीला दीक्षित के निधन के बाद प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जेपी अग्रवाल ने यादें साझा करते हुए कहा कि जब हम लंबे वक्त तक साथ रहते हैं, तो कई बार कुछ मसलों पर विरोध हो जाता है। ऐसा बतौर प्रदेश अध्यक्ष मेरे और तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बीच भी हुआ। कुछ मसलों पर उनकी राय हमसे जुदा रहती थी। काफी तल्ख बहस भी होती, लेकिन शीला दीक्षित ने कभी भी अपने ऊपर अहंकार हावी नहीं होने दिया।

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किसी वजह से कुछ दिनों तक हमारी बात नहीं हो पाती तो वह हमारे घर चली आती थीं या हम उनके घर चले जाते थे। मुलाकात संभव न होने पर फोन पर ही बातचीत हो जाती। हमने आपस में कभी संवादहीनता की स्थिति नहीं आने दी। निजी संबंधों में उन्होंने कभी कटुता नहीं आने दी।  

हमें शीला दीक्षित के हुनर को परखना है तो आज की दिल्ली से इसे समझा जा सकता है। दिल्ली के विकास के ढेरों प्रोजेक्ट की नींव उन्होंने ही रखी। अनूठे प्रशासनिक कौशल से उन्हें अंजाम तक भी पहुंचाया। 1998-2013 के पंद्रह साल दिल्ली के विकास के स्वर्णिम काल रहे हैं।
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दिलचस्प यह है कि शीला दीक्षित बतौर इंसान भी हर किसी का ख्याल रखने वाली थीं। झुग्गी-बस्ती, अनधिकृत कॉलोनियों में जाने पर वह आम लोगों में इस तरह घुल-मिल जातीं, जैसे वह उन्हीं के बीच पली बढ़ी हों। उनका अचानक छोड़कर चले जाना हम सबके लिए बेहद दुखद है। इससे कांग्रेस परिवार समेत पूरी दिल्ली में जो खालीपन आया है, उसे भरना आसान नहीं होगा।

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अंतिम सांस तक पार्टी में प्राण फूंकने में जुटी रहीं

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अंतिम सांस तक प्रदेश कांग्रेस के कायाकल्प के लिए जुटी रहीं। लोकसभा चुनाव से पहले संकट मोचक के तौर पर उन्हें दिल्ली कांग्रेस की बागडोर सौंपी गई और अगामी विधानसभा चुनाव भी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाना था, लेकिन शीला दीक्षित के निधन के बाद गुटबाजी की शिकार प्रदेश कांग्रेस पर एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। 

दरअसल दिल्ली में कांग्रेस अपने नाजुक राजनीतिक दौर से गुजर रही हैं। ऐसे में शीला दीक्षित जैसी दिग्गज और दिल्ली के विकास के तौर पर जाने वाली महिला नेता का निधन पार्टी के लिए अपूर्णीय क्षति है। यह स्थिति तब है जब प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको के बीच शीला दीक्षित गुट के साथ जबरदस्त खींचतान चल रही है।

यह खींचतान तब खुलकर सामने आई थी, जब शीला दीक्षित ने दिल्ली के सभी ब्लॉक स्तर के नेताओं को बदलने का निर्णय लिया था। इसके तुरंत बाद चाको ने शीला दीक्षित के आदेश को रद्द कर दिया था। वह प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद दिल्ली में संगठन को मजबूत करना चाहती थीं, लेकिन अब एक बार फिर प्रदेश कांग्रेस में बिखराव की स्थिति बनती दिख रही है।

लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस को उम्मीद जगी थी कि शीला दीक्षित के नेतृत्व में आगामी विधानसभा चुनाव में अपने विरोधी दलों के खिलाफ बेहतर प्रदर्शन करेगी, लेकिन उनके निधन के बाद गुटबाजी और बढ़ने की आशंका है।

सबसे बड़ी बात है कि पार्टी अपने सभी कद्दावर नेता, जिसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन, पूर्व मंत्री अरविंदर सिंह लवली, जयप्रकाश अग्रवाल को पार्टी की कमान सौंप कर आजमा चुकी हैं। अब पार्टी आलाकमान को प्रदेश की बागडोर किसे सौंपी जाए इसके लिए भारी मशक्कत करनी होगी। 
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