दिल्ली को मॉडर्न लुक देने वाली पूर्व सीएम शीला दीक्षित खुद भी कम मॉडर्न नहीं थीं। पश्चिमी संगीत सुनना उन्हें पसंद था और नए नए जूते पहने की भी शौकीन थीं। आत्मकथा ‘सिटीजन डेल्ही : माय टाइम्स, माय लाइफ’ में दिवंगत नेता ने खुद यह जिक्र किया है।
उन्होंने लिखा, मैं घंटों रेडियो पर अपने प्रिय गानों के आने का इंतजार करती। किताबें पढ़ने में भी खूब सुकून मिलता। स्कूल के दिनों का जिक्र करते हुए वह कहतीं, पिता जी जिमखाना क्लब के सदस्य थे और उनका परिवार क्लब के पास डूप्लेक्स लेन में रहता था, वह वहां से हर हफ्ते छह किताबें लातीं और अगले सप्ताह तक उन्हें पढ़ डालतीं।
निड ब्लायटन की कहानियां ‘फेमस फाइव’, रिचमल क्रॉम्पटन की ‘जस्ट विलियम्स’, एलेक्जेंडर डमास की ‘थ्री मस्कीटयर्स’ और विक्टर हूगो की ‘लेस मिजरेबल्स’ को वह खूब पढ़तीं थीं। उनकी पसंदीदा किताबे लुइस कैरल की ‘एलिस इन वंडरलैंड’ व ‘थ्रू द लुकिंग ग्लास, व्हॉट एलिस फाउंड देयर’ और शरलॉक होम्स की सीरीज हैं।
शुक्रवार की रात पश्चिमी संगीत के नाम
शीला हर शुक्रवार की रात पश्चिमी संगीत के लिए बुक रखती थीं। रेडियो पर आने वाले ‘अ डेट विद यू’ कार्यक्रम में उनके पसंदीदा और नए गाने आते और वह रेडियो से कान लगाकर डोरिस डे और हेनरी बेलाफोंट का इंतजार करती रहतीं।
जनपथ से मिलते थे जूतों के नए स्टाइल
शीला का ब्र्रांड्स से पुराना नाता था लेकिन स्टाइल अच्छा हो तो वह पटरी से जूते खरीदने से भी गुरेज नहीं करती थीं। शीला ने आत्मकथा में लिखा कि जनपथ से उन्हें जूतों में नया स्टाइल मिलता और पटरी की इन दुकानों ने ही उन्हें बड़े ब्रांड बाटा और बलूजा से छुटकार दिलाया। उन्हें जनपथ से तीन रुपये में मिलने वाली भड़कीले रंगों के स्ट्रैप वाली फ्लैट सेंडल रास आने लगीं।
पांच रुपये जेब खर्च मिलता था, थियेटर में देखी थी ‘हेमलेट’
शीला को पांच रुपये जेब खर्च के मिलते, वह इन्हें बचातीं और इन पैसों को इकट्ठा कर अलग अलग रंगों की जूतियां खरीदतीं। फिल्मों का भी उन्हें खूब शौक था, शीला ने थियेटर में पहली फिल्म ‘हेमलेट’ देखी थी।