सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को शरीयत कोर्ट पर एक अहम फैसला सुनाते हुए इसे अवैध बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शरीयत अदालतों को कानूनी दर्जा हासिल नहीं है।
कोर्ट के मुताबिक इस्लाम धर्म के पीड़ितों की अपील पर शरीयत कोर्ट फतवा तो जारी कर सकती है, लेकिन इस फतवे को मानने के लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।
जस्टिस सीके प्रसाद और पिनाकी चंद्र घोष की पीठ ने सोमवार को यह फैसला सुनाया। शरीयत कोर्ट को राय देने का अधिकार है लेकिन उसे दो लोगों के मामले में दखल देने का अधिकार नहीं है।
एक वकील ने डाली थी याचिका
दिल्ली के वकील विश्व लोचन मदन ने शरीयत कोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका के अनुसार शरीयत कोर्ट असंवैधानिक हैं और न्यायालय के समानांतर कोर्ट के तौर पर काम करती हैं।
याचिका में इस तरह की अदालतों पर मुस्लिमों की धार्मिक और सामाजिक आजादी की सीमा निर्धारित करने की बात थी। इसी मामले में फरवरी में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को सुरक्षित रखते हुए कहा था कि यह लोगों की आस्था का मामला है और तब कोर्ट ने इसमें दखल देने से इनकार कर दिया था।
वहीं, तत्कालीन यूपीए सरकार ने भी कोर्ट से कहा था कि वह मुस्लिम पसर्नल लॉ के मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी। जब तक किसी के मौलिक अधिकारों के हनन होने की बात सामने न आए।
क्या होता है शरीयत कोर्ट?
शरीयत कोर्ट मुस्लिम धर्म के कायदे-कानून से संबंधित एक तरह का न्यायालय है। जब कोई व्यक्ति किसी पारिवारिक, संपत्ति या विवाह के विवाद में इस्लाम धर्म के मुताबिक फैसले के लिए काजी या मुफ्ती के सामने अर्जी देता है, तो मुफ्ती या काजी उस अर्जी पर दूसरे पक्षकार को नोटिस जारी कर बुलाता है।
इसके बाद काजी और मुफ्ती दोनों पक्षों की दलीलें सुनता है और शरीयत के मुताबिक फैसला देता है। गौरतलब है कि मुस्लिम धर्म के पर्सनल लॉ में इस तरह की अदालतों की मान्यता है।
जब कोई व्यक्ति मुफ्ती या काजी से किसी मसले पर राय मांगता है तो काजी या मुफ्ती कुरान और हदीस के मुताबिक उस मसले पर राय देते उसे फतवा कहा जाता है।